प्रकृति साम्य जीवन सुख का आधार
   Date18-Jan-2020

dharmdhara_1  H
धर्मधारा
भौतिक जगत में जीवन बुरी तरह भाग रहा है। मनुष्य अपने स्वभाव से विपरीत दिशा की ओर अग्रसर है। वह अपनी प्रकृति से प्रतिपल विमुख हो रहा है। यह सोचने-समझने का अवसर भी नहीं मिल पा रहा कि इतनी भागदौड़ की अंतिम प्राप्ति क्या होगी। जीवन के बारे में समुचित चिंतन करना अच्छी बात है, पर प्रतियोगी व प्रतिस्पर्धा बन विचार पर विचार चढ़ाना और किसी एक विचार के क्रियान्वयन से लाभांवित होने से हमेशा वंचित रह जाना, यह द्वैत है। इससे कुण्ठा व मानसिक असंतुलन होता है। जिस तरह घर की साफ-सफाई करने के बाद हम अनावश्यक सामान को छांटकर फेंक देते हैं, यदि उसी प्रकार विचारों के घर की भी प्रतिदिन सफाई कर अनावश्यक विचारों को फेंक दें, तो हमारे जीवन पर बहुत सुखद असर होगा। आज अधिकांश मनुष्य विचारों के जंजाल में उलझे हुए हैं। इस समय सभी को आत्मपरीक्षण की जरूरत है। विचारों की परख कर उनमें से लाभकारी विचार सहेजें। उलझन बढ़ाने वाले विचारों का शमन करें। यह कार्य नियमित करें। इससे चमत्कारिक परिणाम मिलेंगे। विचारों के उद्वेलन से छूटने के लिए प्रकृति की दिनचर्या पर ध्यान लगाएं। देखें कि कैसे सुबह से शाम तक प्रकृति अपना दिन गुजारती है। वृक्षों के बारे में सोचें। अपने जीवन के लिए उनकी प्राकृतिक उपयोगिता का विचार करें। वृक्ष की जड़ों से लेकर उसके फलों तक का प्रयोग मनुष्य की जिंदगी की किसी न किसी जरूरत के लिए हो रहा है। इस भाव में वृक्ष के प्रति आभार प्रकट करें। फूलों के रंग-बिरंगे गुच्छे, हरी घास, सूर्योदय, नीला आकाश, सूर्यास्त, चंद्रोदय, सितारों की टिमटिम और आकाश में उड़ते पक्षियों को देखें। सामान्य रूप से यह सब कुछ विशिष्ट नहीं होता। ऐसा इसलिए होता है कि इन प्राकृतिक घटनाओं के प्रति हम विवेकशील होकर नहीं सोचते। लेकिन यदि हम प्रकृति के इन कारकों की दिनचर्या और इनके कार्यों व अस्तित्व के बारे में गहनता से मनन करें, तो हमें यही कारक धरती पर अनमोल अनुभव प्रदान करेंगे। हम प्राय: तरह-तरह के जीव-जंतुओं का प्राकृतिक विचरण और पक्षियों को धीमें व शांति गति से गगन विचरण करते देखते हैं। वे प्रकृति के नियमों से सदैव जुड़े रहते हैं। प्रात:काल से उनका चलना-विचरना और कलरव प्रारंभ हो जाता है। रात होते ही वे अपने आश्रय स्थलों व घोसलों में पहुंच जाते हैं। उनके जीवन में राष्ट्र, धर्म और जीवन के मतैक्य नहीं होते। वे जीवन के स्वभाव में जीते हैं। प्राकृतिक नियमों से संचालित होते हैं। इसीलिए उन्हें भौतिक संसाधनों की भी आवश्यकता नहीं होती।