राउत का कड़वा सच और कांग्रेस बेसुध...
   Date17-Jan-2020

vishesh lekh_1  
महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना के सांसद संजय राउत हलचल मचाने वाले बयान देते रहते हैं... ऐसी बयानबाजी वे कोई पहली बार नहीं कर रहे हैं, लेकिन इस बार उनकी बयानबाजी को लेकर हर कोई सचेत रहता है... क्योंकि अभी महाराष्ट्र में सरकार बने हुए ज्यादा समय नहीं हुआ है और यह गठबंधन सरकार तीन पहियों पर चल रही है, जिसमें मुख्य किरदार भले ही शिवसेना निभा रही हो, लेकिन रिमोट कंट्रोल के रूप में उसे राकांपा प्रमुख शरद पवार ही संचालित कर रहे हैं और सरकार के जरिए जो स्वार्थ साधना है, उसमें कांग्रेस पूरी मग्न है... ऐसे में कोई बयान आए और सरकार में शामिल दलों में ही खटपट शुरू हो जाए, तो विचार किया जा सकता है कि सरकार कितने दिनों तक खिंच पाएगी..? संजय राउत ने बुधवार को जो बात कही, वह कड़वा सच है, जिसे नकारा नहीं जा सकता... तभी तो कांग्रेस राउत के बयान से बेसुध नजर आ रही है... उसे समझ नहीं आ रहा कि वह सरकार से हटने की धमकी दे या सिर्फ राउत से बयान वापस लेने तक ही सीमित रहे... राउत ने कहा था कि देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी स्वयं मुंबई के अंडरवल्र्ड डॉन करीम लाला से मिलने आया करती थीं... बस बयान ने आग में घी का काम किया, कांग्रेस तिलमिला तो गई, लेकिन जवाबी बयान या हमलावर होने से बचती रही... हो सकता हो, आंतरिक रूप से कांग्रेसियों ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के जरिए संजय राउत की क्लास ली होगी, लेकिन वास्तविकता तो यही है कि संजय राउत ने सच उगलकर न सिर्फ कांग्रेस को, बल्कि राकांपा और शिवसेना को भी आईना दिखाया कि वे किस तरह के बेमेल गठबंधन में शामिल हैं...
गैंगेस्टर करीम लाला से आखिर देश का पूर्व प्रधानमंत्री मिला करता हो, इसके क्या मायने है..? क्योंकि 1960 के दशक से 1980 के दशक तक देश की आर्थिक राजधानी और मायानगरी मुंबई में इसी करीम लाला ने शराब तस्करी, जुआ, जबरन वसूली, अपहरण, हीरे-जवाहरत की तस्करी जैसे अपराध को न केवल आगे बढ़ाया, बल्कि संरक्षण के रूप में भी उभरकर सामने आया था... यहां तक कि उद्योगपतियों व बड़े लोगों का अपहरण करवाकर उन्हें छुड़वाने के लिए मोटी रकम वसूलने का खेल भी यही करीम लाला करता था... यह करीम लाला 21 साल की उम्र में अफगानिस्तान छोड़कर पाकिस्तान के पेशेवार के रास्ते मुंबई पहुंचा था... इसके बाद उसने मुंबई में अपनी अपराध की दुनिया को अलग तरह से ही खड़ा किया था... कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी करीम लाला को अमीर-गरीब का समान रूप से सहयोगी एवं सहायता करने वाला बताने का अपराध करने से भी नहीं चूकते, लेकिन वास्तविकता यही है कि वह अंडरवल्र्ड डॉन दाऊद इब्राहिम से भी बढ़कर घृणित अपराधों की जड़ था... उसी ने दाऊद जैसे को पनाह दी और बाद में आगे बढऩे का मौका भी दिया... अगर ऐसे अपराधियों से इंदिरा गांधी का मिलना-जुलना था, तो विचार किया जा सकता है कि वह किस सत्ता की शह पर अपने अपराधों की दुनिया को चला रहा था..?
दृष्टिकोण
परीक्षा पद्धति में फिर बदलाव...
मध्यप्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल ने पुन: निर्णय किया है कि पांचवीं, आठवीं की परीक्षाएं बोर्ड पद्धति के अनुसार होंगी... यह निर्णय जितना स्वागत योग्य है, उतना ही सवालों से घिरा हुआ भी है... बच्चों को परीक्षा के दौर से गुजरने की आदत शुरुआत से ही होना चाहिए... इसीलिए हमारे यहां पांचवीं-आठवीं और दसवीं-बारहवीं को बोर्ड पद्धति के अंतर्गत परीक्षाओं के रूप में शामिल किया गया था... ताकि इसके जरिए किसी विद्यार्थी की नींव को बीच-बीच में परखा जाए, कि वह किताबी और व्यवहारिक ज्ञान कितना प्राप्त कर पा रहा है..? पांचवीं-आठवीं में जब बोर्ड पद्धति लागू थी, तो यह बच्चों के लिए ही नहीं, अभिभावकों के लिए भी चिंता का विषय होती थी... लेकिन जब दिग्विजय सरकार ने अपनी पहली पारी में ही पांचवीं, आठवीं की बोर्ड परीक्षा पद्धति को रद्द किया, उसके बाद जो बिगाड़ शैक्षणिक जगत में होना था, वह बढ़ता ही चला गया... इसमें विद्यार्थियों का नुकसान सर्वाधिक हुआ, क्योंकि जो कमजोर थे, जिन्हें पांचवीं, आठवीं की बोर्ड परीक्षा में एक-दो वर्ष रोकना था, वे सीधे दो-दो, तीन-तीन साल तक ही दसवीं में ही धक्के खाते रहे और बदनाम हुई हमारी शिक्षा व्यवस्था... अब अगर वर्तमान सरकार ने पुन: पांचवीं-आठवीं में बोर्ड परीक्षा पद्धति को लागू करने का निर्णय लिया है तो विचार यह भी होना चाहिए कि क्या जिस तरह से पहले पांचवीं-आठवीं के लिए परीक्षा केन्द्र और परीक्षा केन्द्र के अध्यक्ष बनाने, नियुक्त करने को लेकर धांधलियां होती थी, परीक्षा केन्द्र निर्धारण के लिए भी रिश्वत चलती थी और थोक में बच्चों को नकल करवाकर पांचवीं से छठी और आठवीं से नौवीं में पहुंचाने का गोरखधंधा चला रखा था, वह पुन: शुरू हो जाएगा या सही मायने में बोर्ड परीक्षा के जरिए ही योग्य विद्यार्थी ही अगले कक्षा में जा पाएंगे..., तब इस पर विचार होगा, तभी यह नई परीक्षा व्यवस्था अपना ओहदा कायम रख पाएगी...