अध्यात्म की साधना का मार्ग हंै कलाएं
   Date17-Jan-2020

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धर्मधारा
(गतांक से आगे)
जै से 'शंकरा नाद शरीरापराÓ आदि। भक्त रामदास ने सरकारी पैसों से भद्राचलम् में श्रीराम मन्दिर बनवाया था। इससे उसे कारावास की सजा हुई। भक्त रामदास (कंचली गोपन्ना) ने आनन्द भैरवी राग में कुछ भजन निर्मित किये। इसी प्रकार पुरन्दरदास को कर्नाटक गान का पितामह माना जाता है। श्री कृष्ण देव राय ने इनका सम्मान किया था। विजयनगर राजाओं के समय 'नाट्य शैलीÓ प्रचलित थी, जिसमें भक्ति, प्रेम तथा शृंगार रसों की प्रधानता होती थी। इसके लिए मंदिरों में अलग से नाट्य मण्डपों का निर्माण किया जाता था। तंजाऊर के नायक राजाओं का समय 'यक्षगानÓ का स्वर्णयुग माना जाता था। आगम शास्त्रों के आधार पर विकसित हुई आराधना नृत्य रीति को आगम नृत्य रीति भी कहते हैं। यह नृत्य रीति मंदिरों में अपनायी जाती थी। कृष्णा नदी के तट पर स्थित कूचिपूडि नामक ग्राम विजयवाड़ा से 60 कि.मी. दूरी पर स्थित है जो कूचीपुडी नाट्यकला के पितामह सिद्धेन्द्र योगी का जन्म स्थान है। दक्षिण काशी के नाम से प्रसिद्ध मन्दिर द्राक्षारामम् भी कलाकारों का आश्रय स्थल रहा। वरंगल के पास रॉमप्पा अद्वितीय शिल्पकला के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के स्तम्भों पर अंकित नृत्य भंगिमाओं का अध्ययन कर, प्रसिद्ध नर्तक स्व. नटराज रामकृष्ण ने आन्ध्र में पेरिणी नृत्य शैली का पुनरुद्धार किया। बिना किसी सरकारी सहायता के उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन इस नृत्यशैली के विकास में लगा दिया। 5 इसी प्रकार तिरुपति, द्राक्षारामम्, भद्राचलम्, मंगलागिरि मंत्रालय (तुंगभद्रा के तट पर), मुक्तेश्वरम्, लेपाक्षी, मीनाक्षी आदि भव्य मन्दिर हैं, जिन्होंने जन-सामान्य का आध्यात्मिक मार्ग प्रशस्त करने के साथ-साथ संगीत, साहित्य और नृत्य कलाओं को प्रश्रय दिया। हिन्दू शास्त्रों में साहित्य-संगीत-नृत्य आदि के माध्यम से मानव ईश्वरीय आराधना करता है। कलाओं की साधना एक ऐसा मार्ग है, जो मनुष्य को उदात्त की ओर ले जाता है। आध्यात्म की साधना का मार्ग है कलाएँ। जो व्यक्ति कला की साधना में डूब जाता है, वह जगत के काम-क्रोध-लोभ आदि से क्रमश: मुक्त होता जाता है और अन्तत: सात्विक आनन्द में लीन हो जाता है। सम्पूर्ण भारत में, भजन, कीर्तन, नर्तन, संगीत, चित्रकला, स्थापत्य आदि ऐसी कलाएँ हैं, जो मनुष्य को साधना के उच्च सोपान पर ले जाती हैं। (समाप्त)