अध्यात्म की साधना का मार्ग हंै कलाएं
   Date16-Jan-2020

dharmdhara_1  H
धर्मधारा
म न्दिर हिन्दू संस्कृति में एक महत्वपूर्ण इकाई है। प्राचीन काल से मन्दिरों ने महत्वपूर्ण धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक व कलात्मक भूमिका निभायी है। मंदिर शिल्प कला और स्थापत्य के नमूने व आदर्श रहे हैं। विशाल मन्दिरों के प्रांगण भरत नाट्यम, कुचीपुड़ी, यक्षगान, कथककली तथा अन्य नाट्य कलाओं के प्रश्रय व प्रशिक्षण केन्द्र रहे हैं। अक्सर रात-रात भर विभिन्न वेश-भूषाओं को धारण कर, नाट्य गृह में धार्मिक-पौराणिक नाटक खेले जाते रहे। केरल हो या आन्ध्र, तमिलनाडु, गुजरात हो या बंगाल, मध्यप्रदेश हो या असम, मणिपुर हो या मैसूर सर्वत्र मन्दिरों ने कला पोषण की अद्वितीय व ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। सोमनाथ मन्दिर में एक हजार नर्तकियां थीं, जो बारी-बारी से भगवद् आराधना के समय विविध नृत्य प्रस्तुत करती थीं। खजुराहो, रामेश्वरम्, श्री पद्मनाभ मंदिर, गुरुवायुर काबकृष्ण मंदिर आदि में नर्तक-नर्तकियां नृत्य प्रस्तुत किया करते थे। कहना न होगा- भारतीय धर्म नृत्य और संगीत के माध्यम से ईश्वरीय अनुग्रह प्राप्त करने में विश्वास करता है। चैतन्य महाप्रभु स्वयं नर्तन करते हुए परमानंद की अवस्था में पहुंच जाते थे। उसी प्रकार ताल्लपाक अन्नमाचार्य ने भगवान् वेंकटेश्वर को नायक बनाकर अनेक गीतों की रचना की। यह कार्य उन्होंने तिरुपति में रहकर किया। उसी प्रकार त्यागराजकृत हजारों कृतियाँ आज भी गायी जाती हैं। इन कवियों को 'वाग्गेयकारÓ कहा जाता है। वाक+गेय- अर्थात् इनके सारे पद राग-रागिनियों में बंधे होते थे। सूरदास के पद भी 'वाग्गेयÓ पदों के अन्तर्गत आते हैं। उन्होंने भी गोवद्र्धन पर्वत पर स्थित भगवान् कृष्ण की प्रशस्ति में सहस्रों पदों की रचना की जो राग-रागिनियों में बंधे हैं। दक्षिण के कवि इसे 'नादोपासनाÓ कहते हैं। नादेश्वर श्री शंकर भगवान् की स्तुति से प्रारम्भ होता है गायन। (क्रमश:)