कार्यशैली में सुधार से संभव तनाव मुक्ति
   Date15-Jan-2020

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धर्मधारा
का र्य करना हम सभी के जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है। इसी कार्य के माध्यम से हम अपने जीवन में नई उपलब्धियां हासिल करते हैं। जीवन की आवश्यकताएं व जरूरतें पूरी करते हैं, पैसा कमाते हैं और इसके माध्यम से जीवन का आनंद लेने की कोशिश करते हैं, लेकिन जब हमारे जीवन में तरह-तरह की परेशानियां आती हैं, कई तरह के दबाव आते हैं, जिन्हें दूर करने के लिए हमें अतिरिक्त श्रम व कार्य करना होता है, या हमारी कामनाएं जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए हम अपनी निर्धारित समय-सीमा से अधिक कार्य करते हैं, तो ऐसे कार्य हमारे लिए प्राय: नुकसानदेह होते हैं और इनके भयावह परिणाम जीवन में देखने को मिलते हैं।
जीवन की चमक-दमक सबको आकर्षित करती है और इस आकर्षण के कारण ज्यादातर लोगों की यह कामना होती है कि उन्हें ऐसे काम मिलें, जिनसे वे जीवन की सभी सुख-सुविधाओं का उपभोग कर सकें। हमारे समाज में कुछ लोग ऐसे होते भी हैं, जो भांति-भांति के सुखों का उपभोग करते हैं। लेकिन इस सुख-भोग कमाने के विपरीत प्रभाव भी जीवन पर पड़ते हुए देखे गए हैं। जैसे- काम के अत्यधिक दबाव या लगातार जरूरत से ज्यादा घंटे काम करने के फलस्वरूप उपजे तनाव के कारण मौत की खबरें भी आए दिन देखने को मिलती हैं। इसका एक उदाहरण जो सामने आया, वह हैजापान में 159 घंटे का ओवरटाइम करने वाली एक रिपोर्टर की मौत। हालांकि जापान की राजधानी टोकियो के सार्वजनिक प्रसारक एनएचके की 31वर्षीया रिपोर्टर मिवा सादो की मौत जुलाई, 2013 में ही हो गई थी, लेकिन चार साल के बाद यानी सन् 2017 में इस बात की स्वीकारोक्ति हुई कि उसकी मौत का कारण 159 घंटे का ओवरटाइम ही था। इसके साथ ही इस बात की भी बहुत चर्चा हुई कि वह मोबाइल पकड़े हुए मृत पाई गई। मिवा सादो के माता-पिता ने ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए ही इस घटना को पूरी तरह से अनावृत करने का दबाव बनाया, तब जाकर इस घटना का पूरा सच लोगों को पता चला।
जापान पहले से ही ओवरटाइम व अत्यधिक काम के लिए जगविख्यात है। इसमें सुधार के लिए समय-समय पर आवाजें भी उठती रही हैं, कई नियम भी बदले गए हैं, पर यहां की नीति में अभी तक कोई बड़ा सुधार नहीं दिखा है। 159 घंटे ओवरटाइम करना अपने आप में आश्चर्यजनक बात है, लेकिन जिन्हें हम आज की विकसित अर्थव्यवस्था कहते हैं, वहां के लिए यह सामान्य बात है, क्योंकि आज पूरी दुनिया ही इसी राह पर चल पड़ी है। यह चलन आज दुनिया की त्रासदी बनता जा रहा है और हमारा देश भारत भी अब इस त्रासदी से अछूता नहीं है।