विदेशी सहायता को ठोकर
   Date14-Jan-2020

prernadeep_1  H
प्रेरणादीप
2, मार्च 1902 में मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानंद) ने गंगाजी के तट पर हरिद्वार में गुरुकुल की स्थापना की। अंग्रेज सरकार गुरुकुल की स्थापना से घबरा गई थी। उनके अधिकारियों के मन में यह उत्सुकता हमेशा ही बनी रहती थी कि जंगल में स्थित गुरुकुल में होता क्या है? यह सब जानने के लिए कई अंग्रेज अधिकारी कई बार गुरुकुल में आए। सन् 1906 में भारत के वाईसराय लार्ड चेम्सफोर्ड तक वहाँ पधारे। उन सबके आने का कारण एक और था। वे सोचते थे कि यदि गुरुकुल को सरकारी मान्यता व आर्थिक सहायता दी जाए, तो वह पूर्ण स्वतंत्र नहीं रह सकेगा। धीरे-धीरे उस पर सरकारी अंकुश हो जाएगा। भविष्य में गुरुकुल सरकार विरोधी नहीं बन पाएगा। गर्वनर मेस्टन ने श्रद्धानंदजी से कहा- आप गुरुकुल में अपना ही पाठ्यक्रम रखिये। सारा प्रबंध भी अपनी इच्छानुसार कीजिये। केवल गुरुकुल को राज्य से संबंधित कर दीजिए। आपको प्रतिवर्ष एक लाख रुपए की सहायता मिला करेगी, लेकिन कुलपति स्वामी श्रद्धानंदजी महाराज अंग्रेज की चाल को भाँप चुके थे। उन्होंने धरती पर पैर पटकते हुए आवेश से कहा- मैं ऐसी सहायता पर ठोकर मारता हूँ। यह देख और सुनकर गर्वनर मेस्टन भौचक्के रह गए।