वैश्विक देशों की नागरिकता के संदर्भ में संकल्पना
   Date14-Jan-2020

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पराग विश्वासराव बि-हाड़े
त स्लीमा नसरीन ने कहा- मुझे खुशी है कि पड़ोसी देशों के सताए गए लोगों को भारतीय नागरिकता मिल जाएगी, भले ही वे अवैध प्रवासी हों। यह एक तथ्य है कि बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में हिंदुओं को निशाना बनाया जाता है। आप इस विधान पर अनुमान लगा सकते हैं कि नागरिकता संशोधन की आवश्यकता क्यों पड़ी। जो भारत में रहने वाले हैं, उन्हें सम्भवत: अन्य देशों में हिन्दुओं को मिलने वाली ट्रीटमेंट के बारे में पता नहीं चल सकता, किंतु हमारे देश में हमारा चाल-चलन उनकी तुलना में निर्वासितों से हमेशा बेहतर ही रहा है। इस बिल के प्रावधान में हमें ये देखना भी दिलचस्प होगा कि दुनियाभर में नागरिकता के प्रावधान कौन-कौन से जन्मजात नागरिकता और कानूनन नागरिकता ये दो मुख्य प्रावधान मूलत: सभी देशों में हैं। कुछ देशों में रक्त संबंध (जूस सांगुनिस) और कुछ में मिट्टी संबंध (जूस सोली) का दाखिला देकर नागरिकता बरकरार रखा हुआ है। आइए इन देशों की कुछ नागरिकता प्रावधानों की बात करते हैं। फ्रांस और डोमिनिकन गणराज्य दो देश हैं, जिन्होंने हाल के वर्षों में जन्मजात नागरिकता कानूनों को बदल दिया है। 2013 में, डोमिनिकन रिपब्लिक के सुप्रीम कोर्ट ने एक कानूनी बदलाव को बरकरार रखकर लगभग 250,000 पूर्व डोमिनिकों से नागरिकता छीन ली थी, क्योंकि उनके माता-पिता उनके जन्म के समय वहाँ के नागरिक नहीं थे।
ऑस्ट्रेलिया में, जिसने एक समय में जन्मजात नागरिकता की पेशकश की थी, वहाँ 1986 में नागरिकता केवल एक ऑस्ट्रेलियाई नागरिक या कानूनी स्थायी निवासी के माध्यम से पैदा हुए बच्चों के लिए स्वचालित रह गई। हालांकि, ऑस्ट्रेलिया में जन्मे बच्चे जो जन्मजात वहाँ के नागरिक नहीं हैं, वे स्वत: 10 वर्ष की आयु में नागरिक बन जाते हैं, यदि वे अपने जीवन का अधिकांश समय वहाँ बिता चुके होते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका उन देशों की लंबी सूची में से एक है, जो जूस सोली (मिट्टी का अधिकार) की नागरिकता को मान्यता देते हैं। अमेरिका महादेश में अधिकांश राष्ट्रों ने जैसे कनाडा, मैक्सिको (जो कि जन्म के समय राष्ट्रीयता को मान्यता देता है) और मध्य और दक्षिण अमेरिका को शामिल करते हुए जूस सोली को ज्यादा महत्व देते हैं। अमेरिका के बाहर, जूस सॉलिसी नीतियाँ दुर्लभ हैं। यूरोप, एशिया और अफ्रीका के अधिकांश हिस्सों में और कहीं-न-कहीं जूस सँगनिस (रक्त के अधिकार से) नागरिकता का कुछ रूप है, जो आमतौर पर उस देश के राष्ट्रीय स्तर पर पैदा हुए बच्चों को दिया जाता है। फ्रांस में, जहाँ जूस सोली नागरिकता एक बार आदर्श थी, वहाँ 1993 के बाद से कानून में बदलाव से ये स्पष्ट हुआ कि विदेशी नागरिकों के फ्रेंच में जन्मे बच्चों को अपनी किशोरावस्था के बाद की तिथि में या वयस्कता तक पहुँचने पर नागरिकता का अनुरोध करना अनिवार्य होता है।
जर्मनी में सन् 2000 तक जूस सँगुनिस का प्रचलन था, जब कानून संशोधित किया गया था। आज, गैर-जर्मन माता-पिता से पैदा हुए बच्चों को जन्म के समय जर्मन नागरिकता प्रदान की जाती है, यदि एक माता-पिता कम से कम तीन साल के लिए वहाँ के कानूनी स्थायी निवासी रहे हों या जर्मनी में आठ साल तक रहे हुए हों। इन बच्चों को बाद में 23 वर्ष की उम्र तक जर्मन नागरिकता बनाए रखने के लिए आवेदन करना जरूरी होता है। यूनाइटेड किंगडम में, 1981 में कानून में बदलाव ने सीधे जूस सोली नागरिकता की एक प्रणाली को समाप्त कर दिया। यूके में पैदा हुए बच्चे अब केवल ब्रिटिश नागरिक बन जाते हैं, यदि माता-पिता में से एक या तो ब्रिटिश नागरिक है या कानूनी रूप से वहां बस गए हैं। वहीं यूके के योग्य प्रदेशों में जन्म लेने वाले बच्चों के लिए भी मान्य हो जाता, जो अभिभावक माता-पिता के जर्मनी में पैदा हुए बच्चे अभी भी जन्म के समय जर्मन नागरिक नहीं हैं। इसका परिणाम धोखाधड़ी वाले पितत्व से होता है, जो नागरिकता के लिए ही सिर्फ संबंध बनाते हैं। जिसमें जर्मन पुरुष को फास्ट-फूड पिता के रूप में जाना जाता है, जो बाद मे एक शुल्क के बदले में बच्चे के पिता होने का दावा करते हैं, इस प्रकार यह प्रणाली उस संबंध से पैदा हुए बच्चे को जर्मन नागरिक होने में कानूनन सक्षम बनाती है। जापान और इजरायल जैसे देशों में विदेशी प्रवासी श्रमिकों से इजरायल में पैदा हुए सैकड़ों गैर-नागरिक बच्चों को निर्वासित करने की योजना की घोषणा की थी, जिससे बड़ी मात्रा में दंगे हुए थे। विदेशों में विदेशी माता-पिता से पैदा होने वाले कई बच्चे कम से कम अपने माता-पिता के देश के लोगों को ज्यूस सँगुनिस के आधार पर मानते हैं। संयुक्त राष्ट्र एक व्यक्ति को नागरिक तब तक नहीं मानता, जब तक उसे किसी भी राज्य द्वारा राष्ट्रीय नहीं माना जाता है। संयुक्त राष्ट्र में स्टेटलेसनेस एक संकल्पना है, जिसमें न जन्म वहाँ का और न ही नागरिकता वहाँ की, ऐसा होता है। स्टेटलेसनेस तब भी होता है, जब लंबे समय तक रहने वाली जातीय आबादी को नागरिकता से वंचित कर दिया जाता है। एंटीगुआ और बारबुडा को सीआईएस द्वारा प्रतिबंधित परिवर्तन पर विचार करने वाले देशों के रूप में भी नामित किया गया था। 1980 के दशक के बाद से 'सार्वभौमिक जन्मसिद्ध नागरिकताÓ समाप्त होने के रूप में सूचीबद्ध किए गए देशों में यूके, भारत, माल्टा, आयरलैंड, न्यूजीलैंड और हाल ही में डोमिनिकन गणराज्य शामिल थे। मैक्सिको के संविधान में कहा गया है कि नागरिक 'अपने माता-पिता की राष्ट्रीयता की परवाह किए बिना गणराज्य के क्षेत्र में पैदा हुए हैं, तो उन्हें नागरिकता मिल सकती है।Ó ब्राजील के संविधान के शीर्षक में समान भाषा है- 'ब्राजीलियाई फेडरेटिव रिपब्लिक ब्राजील में जो बच्चे विदेशी माता-पिता से, बशर्ते वे अपने देश की सेवा में न हों, उनसे पैदा हुए हैं, उन्हें वहाँ की नागरिकता मिल सकती है।Ó
यूरोप, अफ्रीका और एशिया में, नागरिकता प्रावधान फ्लेक्जिबल यानी रूपांतरणीय है। फ्रांस का संविधान कई व्यापक प्रावधानों को दर्शाता है, जो सांसदों को नागरिकता का निर्धारण करने की शक्ति प्रदान करता है। इसी तरह इंडोनेशिया में, इसका संविधान निर्दिष्ट करता है कि, नागरिकों और निवासियों से संबंधित मामलों को कानूनी तरीके से नियमित किया जाएगा। दक्षिण अफ्रीका निर्दिष्ट करता है कि नागरिकों को नागरिकता के विशिष्ट अधिकार राष्ट्रीय कानून के तहत मिल सकते हैं। कुछ उत्तरी अफ्रीकी और मध्य पूर्वी राष्ट्र स्पष्ट रूप से उन लोगों के लिए नागरिकता को मान्य करते हैं, जिनके पास कम से कम एक माता-पिता हैं, जो उस देश के कानूनी नागरिक हैं। उदाहरण के लिए, मिस्र का संविधान कहता है कि 'किसी भी व्यक्ति का मिस्र के पिता या मिस्र की माँ से जन्म लेना जरूरी है।Ó यूरोप की स्थिति भी ऐसी ही है। 2012 में, कांग्रेस के लॉ लायब्रेरी ने प्रमुख यूरोपीय संघ के देशों में जन्मसिद्ध नागरिकता पर ध्यान दिया था। ज्यादातर मामलों में, एक बच्चे के माता-पिता की राष्ट्रीयता के लिए जन्मसिद्ध अधिकार नागरिकता से जुड़ा होना कंपलसरी था, कम से कम एक माता-पिता को उस देश का नागरिक होने की आवश्यकता होती है, जहाँ वो बच्चा पैदा हुआ होता है। जन्म के समय माता-पिता द्वारा त्याग दिए गए बच्चों को शर्तों के साथ नागरिकता प्रदान की गई थी। भारत में मोदीजी के नेतृत्व में देश एक नए बदलाव की तरफ झुक रहा है, जो बाद में अगर न किया जाए, तो अगली पीढ़ी एक नए भारत के विभाजन का दु:खद साक्षीदार बन सकती है। रोहिंग्या, बांग्लादेशी और अन्य घुसपैठिये हिंदुस्तान की धरोहर को बदलकर रख देंगे और तब हमारे इतिहास के पास कोई जवाब नहीं होगा।