भारतीय संस्कृति में मकर संक्रांति विशिष्ट पर्व
   Date14-Jan-2020


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धर्मधारा
सां स्कृतिक रूप से भी मकर संक्रांति भारत का विशिष्ट पर्व है। भगवान वासुदेव ने गीता में कहा है कि उत्तरायण में देह त्यागने वाले का पुनरागमन नहीं होता। अर्थात् वह मोक्ष का अधिकारी है। यह गीता शास्त्र भारतीय संस्कृति की आत्मा है। इस उल्लेख से उत्तरायण का महत्व सिद्ध होता है और उत्तरायण का आरंभ मकर संक्रांति से होने से मकर संक्रांति का पर्व अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण हो जाता है। यह भिन्न-भिन्न भाषा और प्राकृतिक विविधता वाले क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न प्रकार से मनाया जाकर, सांस्कृतिक मान्यताओं और परम्पराओं के एक होने का स्पष्ट संदर्भ देता है। वस्तुत: जिसे विविधता में एकता कहा जाता है, भारत में यह पर्व उसी का प्रतीक है। भारतवर्ष के अधिकांश भूभाग में इसे मकर संक्रांति ही कहा जाता है। पंचनद क्षेत्र (पंजाब, हरियाणा, हिमाचल) में इसे माघी भी कहा जाता है।
तमिलनाडु और श्रीलंका में इसे पोंगल, तो असम में भोगली बिहु कहा जाता है। कश्मीर घाटी में शिशिर संक्रांति कहा जाता है, जो ऋतु का वर्णन करती है। उत्तरप्रदेश और बिहार में खिंचड़ी भी कहा जाता है। बंगाल में इसे पौष संक्रांति कहा जाता है। कर्नाटक में मकर संक्रमण और थाईलैंड में सोंगकरन कहते हैं, जो संक्रांति के ही अपभ्रंश से बने शब्द प्रतीत होते हैं। वैसे ही कंबोडिया में भी मोहा संगक्रान, जो माघ संक्रांति का ही अपभ्रंश प्रतीत होता है। ब्रह्मदेश (म्यांमार) में थिंयान और लाओस में पि मा लासो जैसा कुछ कहते हैं। इस प्रकार यह एक ऐसा सांस्कृतिक पर्व है, जिसे दक्षिणी एशिया में किसी न किसी नाम से, किसी न किसी रूप में मनाया जाता है, जो आर्यवर्तीय क्षेत्र की एकता और अखंडता का स्पष्ट प्रमाण है। पंजाब, हरियाणा में इसे एक दिन पूर्व लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है।
व्यवहारिक पवित्रता का यह पर्व विभिन्न भारतीय क्षेत्रों में वहाँ के उपलब्ध संसाधनों एवं भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर निर्मित परम्पराओं, जिनमें धर्म का समावेश अनिवार्य रूप से है, के रूप में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। अधिकांश क्षेत्रों में जब फसलें पक चुकी होती हैं, उसके पश्चात, शीत ऋतु का प्रबल काल मुख्य रूप से बीत चुका होता है और नव सौर संवत्सर का आगमन हो रहा होता है, तो जीवन में नए उत्साह का संचार करने हेतु यह पर्व मनाया जाता है। भारत में नदियों और सरोवरों को तीर्थ कहा जाता है। प्राय: सम्पूर्ण भारत में पवित्र तीर्थों में स्नान कर सूर्य को अघ्र्य दे ईष्टदेव, पितृ पूजन कर अपनी क्षमता अनुसार और परंपरानुसार दान-पुण्य किया जाता है। विभिन्न प्रकार के पकवान और खाद्य पदार्थ निर्मित किए जाते हैं। इस पर्व में तिल का प्रयोग/उपयोग किसी न किसी रूप में लगभग सब जगह होता है।
पंजाब क्षेत्र में लोहड़ी वाले दिन अग्नि जलाकर अग्निपूजन कर उसमें तिल, गुड़, चावल और मक्के की आहुति देने की परंपरा है। साथ ही तिल और मूंगफली की बनी गजक और रेवडियां भी बांटी जाती है। उत्तरप्रदेश और बिहार __ में खिंचड़ी बनाई, खिलाई और खाई जाती है, दान की जाती है। दीर्घकाल से चली आ रही इस परम्परा के कारण ही सम्भवतया इस पर्व का नाम खिचड़ी पड़ गया इस क्षेत्र में । इस गंगा घाटी के क्षेत्र में सारे धान्य उत्पन्न होते रहे हैं। अत: सप्तधान्य खिचड़ी के प्रसाद रूप निर्माण से यह परंपरा कब आरम्भ हुई होगी, इसका ठीक-ठीक कालज्ञान करना भी अब असंभव सा है। पर यह खिंचड़ी अब स्थापित हो चुकी है, जो अब भिन्न-भिन्न प्रकार से बनने लगी है। कहीं कही तिल और चूड़ा का भी प्रयोग होता है। महाराष्ट्र में तिल और गुड़ के दान और इन से बने व्यंजन के सेवन की परंपरा है। वहीं तमिलनाडु में पोंगल के रूप में चार दिन तक मनाने की परंपरा है। जिसे पहले दिन भोगी पोंगल कहते हैं। उस दिन कूड़ा रद्दी और व्यर्थ जलाने योग्य वस्तुएँ एकत्र कर जला दी जाती हैं। दूसरे दिन सूर्य पोंगल कहते हैं, उस दिन ईष्ट देवता की पूजा होती है।
मुख्यतया सूर्य की, लक्ष्मी की पूजा होती है। तीसरे दिन मटू पोंगल होता है, जिसे केनू पोंगल भी कहा जाता है। कहीं-कहीं इस दिन बैलों की व पशुधन की पूजा होती है, बैलो के सींगों का रंगन आदि होता है। चौथे दिन को कन्या पोंगल कहते हैं। इस दिन उपहार आदि स्वजनों को देने की परंपरा है।।
राजस्थान में तिल की बनी वस्तुओं का दान व भोग प्रसाद की परंपरा है। बहुएँ अपने बुजुर्गों से आशीर्वाद लेती हैं। प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में बहुएँ घर के बड़ों, ससुर, और उनके भाई, पिता, काका और ज्येष्ठ आदि को ब्रह्म मुहूर्त में जगाकर उन्हें दातुन करवाकर दुग्ध पात्र प्रदान करती हैं, उन्हें श्रीफल भेंट करती हैं, वस्त्र दक्षिणा आदि भी (अपनी क्षमता अनुसार) प्रदान करती हैं और आशीर्वाद लेती हैं। इस के अतिरिक्त महिलाएँ 13 (कहीं 14 भी) की संख्या में वस्तुओं का दान करती हैं, जो सुवासिनियों (बुआ, सासु, ननद, देवर, ज्येष्ठ और ननद की पुत्रियों) को अथवा ब्राह्मणों को देती हैं। साथ ही अभ्यागतों को भी दान किया जाता है और उनका आशीर्वाद लिया जाता है।