घाटी में 15 देशों के राजनयिक...
   Date13-Jan-2020

vishesh lekh_1  
जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 एवं 35-ए जैसे नासूर से मुक्ति दिलाए लंबा अरसा बीत चुका है... इस दौरान वहां पर हालात पूर्णत: सामान्य भी हो चले हैं... लेकिन कुछ लोग बाल की खाल निकालने की शैली में सिर्फ जम्मू-कश्मीर को चर्चा में बनाए रखना चाहते हैं... तभी तो जम्मू-कश्मीर में अब इंटरनेट पर प्रतिबंध को लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाना और उस पर न्यायालय द्वारा प्रशासन से एक सप्ताह में स्थिति की समीक्षा कर इंटरनेट के इस्तेमाल को मौलिक अधिकार बताने से कुछ अराजक तत्वों की बांछे खिल गई, लेकिन जो विदेशी प्रतिनिधिमंडलों के दौरों को सिर्फ प्रायोजित बताकर सारी वास्तविकता को नजरअंदाज करते रहे हैं... उनकी आंखें खुलना चाहिए, क्योंकि गुरुवार, शुक्रवार यानी दो दिन घाटी में 15 देशों के राजनयिकों ने जम्मू-कश्मीर में भ्रमण किया और जगह-जगह वस्तुस्थिति को जाना... जो नजारा उन्हें देखने को मिला, वह यही है कि जम्मू-कश्मीर में स्थितियां से तेजी से सामान्य हो रही हैं... 15 विदेशी राजनयिकों ने अपनी यात्रा के अंतिम दिन तो विस्थापित कश्मीरी पंडितों, पाकिस्तान से आए शरणार्थियों, विभिन्न सामाजिक संस्थानों, राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक से मिलकर विभिन्न मुद्दों, व्यवस्थाओं, सुविधाओं एवं लोगों की राय को भी जाना... राजनयिकों के प्रतिनिधिमंडल से स्थानीय निवासियों ने स्पष्ट रूप से कहा कि जो बदलाव केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने राज्य में किया है, वह इसकी मांग लंबे समय से कर रहे थे... अब उनको वास्तविकता में अधिकारों, संसाधनों एवं सुविधाओं के मान से समानता का अहसास हो रहा है... भारत की तरफ से विदेश मंत्रालय ने अपना पक्ष रखते हुए जब यह कहा कि हमने राज्य के हालात सामान्य करने के लिए क्या-क्या कोशिशें की, यह बताने के लिए 15 देशों के राजनयिकों को कश्मीर भेजा है... और उन्होंने वास्तविक स्थिति का प्रत्यक्ष रूप में आंकलन भी किया है... अब उन लोगों के मुँह क्यों सिल गए हैं, इस दौरे को निर्देशित करार दे रहे हैं... क्योंकि सरकार कुछ भी अपने पक्ष में बुलवाने के लिए ही इस तरह का काम नहीं करती, बल्कि जब भारत से बाहर 15 देशों के राजनयिक एक मंच पर यह कह रहे हैं कि कश्मीर में स्थिति सामान्य हो चुकी है, जब वे अपने देशों में जाकर भी यही रिपोर्ट प्रस्तुत कर रहे हैं कि कश्मीर में हालात तेजी से सामान्य हो चुके हैं... तब दिशा भ्रम फैलाने वाले विपक्षी नेताओं को अपनी गिरेबां में झांकना चाहिए...
घाटी के दौरे पर आए अमेरिकी राजदूत केनेथ जस्टर, दक्षिण कोरिया के राजदूत शीन बोंगकिल समेत अन्य विदेशी राजदूतों ने अपने प्रवास कार्यक्रम के दौरान चुनिंदा राजनीतिक प्रतिनिधियों, नागरिक संस्थाओं के सदस्यों और शीर्ष सैन्य अधिकारियों के साथ बातचीत भी की... यही नहीं, इस प्रतिनिधिमंडल ने राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं, शैक्षणिक गतिविधियों एवं सुरक्षा संबंधी विषयों पर भी व्यापक विचार-विमर्श किया... इस दौरे के दौरान व्यावसायिक प्रतिष्ठान खुले थे, यातायात भी सामान्य था... इस प्रतिनिधिमंडल ने पश्चिम पाकिस्तान के शरणार्थियों, वाल्मीकि समाज, गुज्जर, बक्करवाल समाज, वकीलों, कश्मीरी पंडितों के साथ भी लंबी बैठक की... इस दौरान स्थानीय लोगों का संयुक्त स्वर यही था कि अनुच्छेद 370, 35-ए के निरस्त होने के बाद जम्मू-कश्मीर वासियों को आरक्षण, वनाधिकार समेत सारी सुविधाओं का लाभ मिलना प्रारंभ हो गया है...
दृष्टिकोण
वामपंथियों के निशाने पर शिक्षण संस्थान...
देश की शिक्षा व्यवस्था को कलंकित करने का काम कम्युनिस्टों ने लगातार किया... और आजादी के बाद जिस तरह का इतिहास लिखा गया, उसमें भारत के शाश्वत स्वाभिमान, संस्कार और सत्य इतिहास को विलोपित करके सिर्फ झूठ फैलाने वाला, प्रपंच रचने वाला और सामान्य भारतीयों को लज्जित करने वाला पाठ पढ़ाने की साजिशें रची गई... वामपंथियों की धुर्तता का इससे स्पष्ट परिचय मिलता है कि उन्होंने भारतीयों के शैक्षणिक पाठ्यक्रम में वास्तविक महापुरुषों, आजादी के आंदोलनकारियों को कहीं लुटेरा तो कहीं आतंकवादी बताने का प्रयास किया, जबकि जिन्होंने भारत को लूटा, बर्बरता से नरसंहार किया, उन्हें लंबे समय तक पाठ्यक्रम में हीरो के रूप में प्रस्तुत करते हुए उनकी दयालुता का भी झूठा अध्याय परोसा गया... अगर इसी मानसिकता से ग्रस्त वामपंथी अब भी देश के शैक्षणिक संस्थानों में राजनीतिक हस्तक्षेप की आड़ में या फिर राजनीतिक नेतृत्व पैदा करने की जुगत में देश के एक बड़े युवा वर्ग को देश के खिलाफ ही खड़ा कर रहे हैं तो यह सिर्फ देश का ही नहीं, बल्कि शैक्षणिक संस्थानों का भी बड़ा नुकसान है... जिसकी भरपाई असंभव होगी... अगर 200 से अधिक शिक्षाविदों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर लेफ्टविंग द्वारा देशभर के शिक्षण संस्थानों में बिगाड़े जा रहे माहौल को लेकर सतर्क किया है, तो यह सच्चाई है... इस पर प्रधानमंत्री को त्वरित निर्णय लेना चाहिए.., क्योंकि जेनेविवि में वामपंथियों का हिंसक रूप हम देख चुके हैं...