राष्ट्र निर्माण का मूल शुद्धता, सहिष्णुता व निरन्तरता
   Date13-Jan-2020

dharmdhara_1  H
धर्मधारा
भा रतीय संस्कृति इतनी प्राचीन है कि यह मानव सभ्यता के आरंभिक काल से शाश्वत चल रही है। एक समय भारतीय संस्कृति को विश्व में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त रहा और आज भी अपने मूल्यों, अपने गुणों तथा सम्पूर्ण विश्व को 'वसुधैव कुटुम्बकमÓ मानने के कारण इसे महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। भारतीय संस्कृति को विश्व पटल पर स्थापित करने तथा सम्पूर्ण मानव समाज द्वारा इसे सम्मान के साथ स्वीकार करने में अनेक महापुरुषों का योगदान रहा है। इनमें गर्व के साथ प्रमुखता से युवा सन्यासी स्वामी विवेकानन्द का नाम सर्वोपरि है। एक सौ पचास वर्षो के अंतराल के बाद भी, समय-कालचक्र चलते रहने के पश्चात् भी स्वामी विवेकानन्द का व्यक्तित्व और कृतित्व कालजयी है। उनकी दूरदर्शिता तब भी स्पष्ट परिलक्षित हुुई, जब हम भारतवासी पराधीन थे और आज भी प्रासंगिक है।
युवा क्या सोचता है? क्या कर सकता है? और जो कभी समाप्त नहीं हो सकता ऐसे कर्तव्य पथ पर चल कर नेतृत्व कर सकता है। इसका श्रेष्ठ और अनुकरणीय उदाहरण है स्वामी विवेकानन्द। स्वामीजी के शब्दों में ''भारत के युवा को आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए उनमें सकारात्मक शक्ति के साथ कलात्मक उर्जा की आवश्यकता है। संक्रमण काल के इस कालखण्ड में युवाओं की सामूहिक चेतना किसी भी चुनौती का सामना दृढ़ता से कर सकती है।
स्वामी विवेकानन्द ने कहा -'यह सही समय है जब देश के युवा सतर्क हैं, विवेकशील जानकार है तथा वर्तमान परिवेश से कुछ क्रोधित भी है, वहीं कतिपय क्षेत्रों में उनके गुणों में कमी भी है, यही कारण है कि हम अविश्वसनीय चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। वर्ग भेद तथा वर्ग संघर्ष आंतरिक रूप से बढ़ रहा है। समाज में विषमता ने बड़ा आकार लिया है। ऐसे में युवाओं की भूमिका अधिक कारगर और प्रभावी हो सकती है।
देश में कई चित्र सामने आ रहे हैं। आज भी महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा की चिंता गहरी हुई है। वहीं आर्थिक विषमता को देखें तो सीमित वर्ग के पास अकूत धन-सम्पत्ति-वैभव-विलासिता है। वहीं दूसरी और देश के एक तिहाई से अधिक आबादी के पास दूसरे वक्त का भोजन तक नहीं होता।