संसद से पारित कानून ही संवैधानिक...
   Date11-Jan-2020

vishesh lekh_1  
अंतत: सालभर रॉफेल विमान की सौदेबाजी को लेकर विपक्ष ने जो झूठ और प्रपंच जनता के बीच फैलाया और बाद में हर स्तर पर मुंह की खाई, यहां तक कि संसद से लेकर देश की सर्वोच्च न्याय पंचायत तक से वही खेल अब नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लेकर भी विपक्ष द्वारा खेला जा रहा है..,लेकिन जनता की अदालत में लड़ाई हार चुका विपक्ष अब देश के न्याय मंदिर में भी सीएए पर मुंह की खा रहा है...क्योंकि न्याय मंदिर ने स्पष्ट कर दिया है कि संसद से पारित कानून अपने आप में संवैधानिक ही माना जाता है...उसे संवैधानिक घोषित करने की आवश्यकता नहीं...हां, न्यायालय का काम उस कानून की संवैधानिक वैधता को परखना है, जिसे हम परखेेंगे भी...लेकिन सीएए पर किसी तरह की सुनवाई तभी संभव होगी, जब देश में सीएए से संबंधित हर तरह की हिंसा पूर्णत: रुक जाएगी...कुल मिलाकर यह सीधा संकेत न्यायालय से विपक्ष को है कि वह अफवाह फैलाना बंद करे...नागरिकता संशोधन कानून सीएए कई स्तरों पर समाज को मथ रहा है...इतने दिन बीत जाने के बाद भी न तो इसका विरोध करने वालों के तेवर कम हुए हैं और न ही इसका समर्थन कर रहे लोगों के उत्साह में कहीं कोई कमी दिखी है... संसद में बना यह कानून जब सड़क से लेकर साइबर मीडिया तक हर जगह नित-नए दृश्य पेश कर रहा है, तो दूसरी तरफ न्यायपालिका को भी इसकी कई जटिलताओं से जूझना पड़ रहा है... कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली 59 याचिकाएं पहले ही अदालत के दरवाजे पर पहुंच चुकी हैं... इनमें कांग्रेस नेता जयराम रमेश की याचिका भी है और भारतीय मुस्लिम लीग की भी...इनमें से कुछ याचिकाओं में कानून पर स्थगन आदेश देने की मांग की गई थी.., हालांकि अदालत ने तुरंत कोई स्थगन आदेश तो नहीं दिया.., लेकिन अगली सुनवाई के लिए 22 जनवरी की तारीख तय कर दी है...लेकिन इस बीच देश के तमाम उच्च न्यायालयों में भी ऐसी ही याचिकाएं दायर हो गई हैं, जिसे लेकर केंद्र सरकार को चिंता है कि एक साथ कई जगह मामला चलने से आने वाले फैसलों में अंतर्विरोध हो सकता है...इस बीच इसी पीठ के सामने एक अलग किस्म की याचिका पहुंची.., और वह भी इस अनुरोध के साथ कि मामले की तुरंत सुनवाई की जाए...यह मांग तो पूरी नहीं हुई.., लेकिन इससे सुप्रीम कोर्ट को अपना रुख स्पष्ट करने का मौका जरूर मिल गया...याचिका दायर करने वाले वकील विनीत ढांडा का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट नागरिकता संशोधन कानून को संवैधानिक घोषित करे...अदालत ने याचिका को न सिर्फ खारिज कर दिया.., बल्कि उसे इस बिना पर निरर्थक भी बताया कि जिस कानून को संसद पास कर चुकी है..,वह पहले ही संवैधानिक है..,उसे अदालत कैसे संवैधानिक घोषित कर सकती है...लेकिन इसके साथ ही प्रधान न्यायाधीश ने इस मौके पर एक और बात कही, जो ज्यादा महत्वपूर्ण है... उन्होंने कहा कि देश इस समय कठिन दौर से गुजर रहा है..,इस समय पहली प्राथमिकता हिंसा रोकने की होनी चाहिए...जब तक हिंसा नहीं रुकती.., अदालत इसकी संवैधानिक वैधता पर विचार नहीं कर पाएगी...
दृष्टिकोण
कांग्रेस-वामपंथियों का बंद...
देशभर में कांग्रेस और वामदलों अर्थात वामपंथियों से जुड़े मजदूर संगठनों ने बंद का आव्हान किया था...जिसे महाहड़ताल और महाबंद जैसे नाम दिए गए थे...इस दौरान बंद का जो असर कांग्रेस व कम्युनिस्ट शासित राज्यों में देखने को मिला...उसकी तुलना में भाजपा शासित व अन्य क्षेत्रीय दलों से जुड़े राज्यों में यह हड़ताल/बंद पूर्णत: बेअसर रहा...कहने का तात्पर्य यह है कि क्या पहले जैसे बंद, हड़ताल या फिर आक्रोश जताने वाले तरीके अब पूर्णत: राजनीतिक स्वार्थ की भेंट चढ़ चुके हैं..,क्योंकि इनका आमजन के मसलों/समस्याओं से कोई गहरा नाता नहीं रह गया है...आखिर जब बजट आने में दो पखवाड़े ही शेष हैं..,तब इन कांग्रेस/वामपंथी राज्यों के मजदूर संगठनों को अचानक रोजगार, महंगाई व अन्य तरह की समस्याओं का भान कैसे हो गया..? इसके पहले तक इन्होंने इस पर कोई पहल क्यों नहीं की...इसका सीधा-सा अर्थ यही है कि देशभर में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लेकर जिस तरह से कांग्रेस और तमाम विपक्षी दल यहां तक कि सारे कम्युनिस्ट भी बैकफुट पर आ चुके हैं और उनके द्वारा देश में लगाई गई आग पर सीएए समर्थकों ने समर्थन का पानी डालना प्रारंभ कर दिया है...अपने बुने हुए जाल में उलझ चुके कांग्रेस-वामपंथी अब रोजमर्राई समस्याओं पर ध्यान केंद्रित कर केंद्र सरकार को सीएए पर मिल रहे समर्थन को नजरअंदाज करने का प्रोपेगेंडा बनाने में जुटे हुए हैं..,लेकिन कांग्रेस-वामपंथियों को केजरीवाल की सरकार के नेतृत्व में दिल्ली में ही निराशा हाथ लगी..,क्योंकि यहां बंद बेअसर रहा है...हां, पश्चिम बंगाल, केरल में बंद का असर जरूर दिखा...लेकिन म.प्र., छत्तीसगढ़, राजस्थान में यह विफल ही रहा है...इसलिए विपक्ष की बेचैनी बढऩा स्वाभाविक है...