स्वभाषा पर गर्व
   Date11-Jan-2020

prernadeep_1  H
प्रेरणादीप
मिदनापुर में स्वामी विवेकानंद की अंंग्रेज शिष्या भगिनी निवेदिता का भाषण हो रहा था। मंत्रमुग्ध जनता उपदेशामृत पान करने में तल्लीन थी। तभी भाषण से प्रसन्न हो कुछ युवकों ने हिप-हिप हुर्रे-हुर्रे का उद्घोष किया। भगिनी निवेदिता ने भाषण के बीच में ही उन्हें डांट कर कहा-चुप रहो। क्या तुम्हें अपनी भाषा का जरा भी गर्व नहीं है? क्या तुम्हारे पिता अंग्रेज थे? क्या तुम्हारी मां गोरी चमड़ी की यूरोपियन थी। अंग्रेजों की नकल करते लज्जा क्यों नहीं आती तुम्हें, यह सुनकर युवक स्तब्ध रह गए। तभी निवेदिता बोली-भाषण के दौरान प्रसन्नता प्रकट करना आवश्यक ही हो तो स्वभाषा में प्रकट करो। बोलो सच्चिदानंद परमात्मा की जय! भारत माता की जय! सद्गुरु की जय! इसे ही शायद कहा गया है रग-रग में गुलामी। बुरे को ही हम अच्छा मानने लगते हैं। हमारा कितना नैतिक पतन उस समय हुआ होगा कि एक राष्ट्रभक्त विदेशी महिला हमें राष्ट्रभक्ति की शिक्षा दे। उस समय हमें शर्मसार होना पड़े।