वैश्विक भूगोल पर वर्चस्व की चौधराहट में अमेरिका
   Date11-Jan-2020

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रमेशचंद्र त्रिपाठी
अमेरिका ने ईरान कमांडर सुलेमानी को मारकर तीसरे विश्व युद्ध का शंखनाद कर दिया है। जिस तीसरे विश्व युद्ध की हम कल्पना पानी को लेकर होगी, कर रहे थे वह प्रभुत्व, वर्चस्व, अहम, दबदबे को लेकर हो रहा है। पानी तो बहाना मात्र है। असली युद्ध तेल और हथियारों की खरीद-फरोख्त को लेकर है। एक हम ही सर्वशक्तिमान हैं दूसरा क्यों ताकतवर बन रहा है। यदि बनेगा तो उसका हम पर कतर देंगे। अमेरिका की अब तक यही नीति रही है। स्वयं तो अमेरिका प्रक्षेपास्त्रों, मिसाइलों, परमाणु बम, हाइड्रोन बम का आविष्कार करता रहता है। दूसरा कोई करने लगता है तो उसका हुक्का-पानी बंद कर देने की धमकी देने लगता है। एक ओर तो अमेरिका विश्व में शांति की अपील करता है, दूसरे देशों से संयम बरतने को कहता है। दूसरी ओर कमजोर, कर्जदार देशों पर युद्ध थोपने की राजनीति करता है। आज हम भले ही महाशक्ति अमेरिका के साधन संपन्न होने के कारण उसकी जी-हजूरी करें लेकिन अंदर ही अंदर हमें भी इस बात का जरूर दुख है कि अमेरिका अपने पैसे और ताकत के दम पर विश्व को क्यों नीचा दिखाता रहता है, क्यों अपना पिछलग्गू बनने पर मजबूर कर देता है। वास्तविकता तो ये हैं कि अमेरिकी दादागिरी से करीब-करीब सब देश परेशान हैं और इसका साथ देते हैं ब्रिटेन जैसे देश। ट्रेडवार को लेकर चीन, रूस, उत्तरी कोरिया पहले से ही उससे दूरी बनाए हुए हैं। इसी ट्रेड वार को लेकर चीन और अमेरिका में शीत युद्ध की भी नौबत आ गई थी। हालांकि ट्रेडवार वास्तविक युद्ध नहीं होता है फिर भी एक-दूसरे की अर्थव्यवस्था पर असर जरूर डाल देता है। जैसे कि नाम से ही ज्ञात हो रहा है कि ट्रेडवार का मतलब है।
व्यापार युद्ध एक-दूसरे की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करना। जब अमेरिका ने चीन प्रांत के हांगकांग के मामले में हस्तक्षेप किया था तो इसके लिए चीन ने अमेरिका को चेताया भी था कि वह हमारे अंदरूनी मामले में दखल न दे फिर भी अेमरिका ने अपनी हेकड़ी दिखाने के लिए हांगकांग की स्वायत्तता के लिए चीन के विरोध में आवाज उठाई थी जो उसे नागवार लगी थी। किसी समय ईरान-अमेरिका का दोस्त हुआ करता था और आज ईरान उसे फूटी आंखों नहीं सुहा रहा है। खाड़ी देश में अमेरिका को युद्ध करते हुए 2 दशक से ऊपर हुए, इन 20 सालों में अमेरिका ने अपने सैकड़ों सैनिक खोये और अरबों-खरबों या इससे भी अधिक रुपए स्वाहा कर दिए सिर्फ अहम के लिए। ईरान-इराक में फूट डालने का काम भी अमेरिका ने ही किया था 1970 के दशक में। तब अमेरिका ने यह दलील दी थी कि इराक कमजोर ईरान को अपनी ताकत के दम पर उसके तेल कुओं पर अधिकार करना चाहता है। 1990 के दशक में उसने इराक पर आक्रमण करके तानाशाह सद्दाम हुसैन को मौत के घाट उतार दिया। उस समय भी खाड़ी देशों ने काफी दिनों तक युद्ध विभीषिका झेली और अब फिर एक बार अमेरिका अपने दबदबे को कायम रखने के उद्देश्य से पश्चिमी देशों को निशाना बना रहा है। अगर सीधी भाषा में बात करें तो अमेरिका विश्व को युद्ध की आग में धकेल रहा है जिसकी लपटें दुनिया को अपने आगोश में लेंगी। इसमें दो राय नहीं है। क्योंकि विश्व दो खेमों में बंटा हुआ है। एक का नेतृत्व अमेरिका करता है, जिसमें ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी आते हैं दूसरा खेमा चीन, रूस, उत्तरी कोरिया, जापान है। हालांकि विश्व की ये महाशक्तियां दोनों देशों से संयम बरतने की अपील कर रही हैं। अमेरिका ईरानी कमांडर सुलेमानी को मारकर भले ही उसे दुनिया के लिए खतरा बता रहा हो और कह रहा हो कि उसके जैसे व्यक्ति को बहुत पहले मार देना चाहिए था, लेकिन उसकी अंत्येष्टि के लिए ईरान में उमड़ी भीड़ को देखकर लगता नहीं है कि वह एक अच्छा व्यक्ति नहीं था। यदि सुलेमानी नेक दिल इंसान नहीं होता तो उसके जनाजे में जो भीड़ देखने को मिली वह भीड़, वह जनसैलाब देखने को नहीं मिलती। यह उसकी लोकप्रियता ही थी कि उसके जनाजे में पूरा इराक उमड़ पड़ा। सुलेमानी ने भारत में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पर भी उसे लताड़ लगाई थी। उसे नसीहत दे डाली थी कि पाक आतंकियों पर लगाम लगाए। आईओसी देशों में ईरान भी एक सदस्य है। जब जम्मू-कश्मीर से 370 ए, 35 ए हटाया गया तो पाकिस्तान ने खाड़ी देशों से हस्तक्षेप करने को कहा, लेकिन खाड़ी देशों ने यह कहकर मना कर दिया है कि यह भारत का अंदरूनी मामला है। किसी देश की आंतरिक सीमा में हम हस्तक्षेप नहीं कर सकते हैं। रही बात अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के दावे की तो हर दूसरे देश का सिपाही दुश्मन देश को आतंकी दिखता है। अमेरिकी विरोध की असली वजह यह है कि उसने ईरान को मिसाइल तकनीकी की जानकारी मुहैया कराई थी और उससे आश्वासन लिया था कि एक या दो मिसाइल के अतिरिक्त बल्क में प्रक्षेपास्त्रों का आविष्कार नहीं करेगा। किंतु ईरान एक के बाद एक मिसाइलों का आविष्कार करता गया। इन प्रक्षेपास्त्रों के आविष्कार पर अमेरिका उसे चेतावनी दे रहा था, लेकिन ईरान इन चेतावनियों को अनसुना कर रहा था। दोनों देशों के बीच तनातनी पिछले दो साल से चली आ रही थी। सुलेमानी के मारे जाने से यह तनातनी युद्ध में परिणत हो गई। अमेरिका के इस हवाई हमले से जहां ईरान बौखलाया हुआ है वहीं उसने कमांडर सुलेमानी की मौत का बदला लेने की ठानी है। ईरान ने एक प्रतिष्ठित शिया मस्जिद पर लाल झंडा फहराकर युद्ध की रंणभेरी बजा दी है। ईरान में लाल झण्डा फहराने का मतलब है कि एक बड़ा युद्ध आ रहा है। लाल झंडे को युद्ध के एक प्रतीकात्मक रूप में माना जाता है ईरान में। शिया परंपरा में लाल झण्डा अन्यायपूर्ण तरीके से फैलाए गए खून का प्रतीक है और शिकार हुए व्यक्ति का बदला लेने की ओर भी इशारा करता है। तेहरान सहित कई अन्य शहरों में भी लाल झण्डा फहराया गया है। यह कोम मस्जिद के इतिहास में पहली बार है कि इमारत के ऊपर लाल झण्डा फहराया गया है। दक्षिण पंथी ट्रम्प के आने से अमेरिका के स्वभाव में भारत के प्रति नरमी जरूर देखने को मिली है, लेकिन कभी-कभी ट्रम्प भी भारत के रूख पर यू टर्न लेने लगते हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो अमेरिका-ईरान दोनों ही भारत के मित्र देश हैं। 370 मसले पर ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी ने भारत का खुलकर समर्थन किया था। यदि पढ़े-लिखे लोग अमेरिका की ओर रूख करते हैं तो औसत दर्जे के पढ़े-लिखे लोग खाड़ी देश में रोटी-रोजगार के लिए हर साल जाते हैं। यानी कि जितने लोग अमेरिका में रोजगार पाए हुए हैं कहीं उससे ज्यादा खाड़ी देशों में लोग रोजगार से जुड़े हुए हैं। इसमें दो राय नहीं है कि अमेरिका ईरान युद्ध में कच्चे तेल के मूल्य में वृद्धि हो जाएगी और विश्व को महंगाई की मार झेलनी पड़ेगी। जो देश विकसित होने का सपना देख रहे हैं या उसकी राह पर पहला कदम बढ़ा दिए हैं। निश्चित ही उनको इस रण संग्राम से झटका लगेगा। उनकी अर्थव्यवस्था डगमगा जाएगी। अभी तक भारत तटस्थ की भूमिका में है। लेकिन अमेरिका-ईरान की तनातनी में भारत को तटस्थ बने रह पाना मुश्किल लगता है, क्योंकि तेल की जरूरतों के लिए हम जहां ईरान और खाड़ी देशों पर निर्भर रहते हैं तो मारक उपकरणों की पूर्ति के लिए हम अमेरिका पर निर्भर रहने से परहेज नहीं कर सकते। सिर्फ मारक उपकरण ही नहीं दैनिक उपभोग-उपयोग की वस्तुओं के लिए भी हमें अमेरिका पर निर्भर रहना पड़ता है।
अमेरिका ने ईरान पर बम बरसाने का इरादा फिलहाल भले ही मुल्तवी कर दिया हो, मगर दोनों देशों के बीच अशुभ टलने के अभी कोई आसार नजर नहीं आते। फारस की खाड़ी में अत्याधुनिक परमाणु मिसाइलों से लैस विशालकाय अमेरिकी नौसेना के बेड़े और ऊपर आकाश में लगातार मंडरा रहे लडाकू विमान इस बात का स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि अमेरिका और ईरान लगभग तीन दशक बाद एक बार फिर युद्ध के मुहाने पर खड़े हैं। दोनों के बीच पिछले कुछ समय से लगातार बढ़ते जा रहे तनाव के बीच ताजा मामला है ईरान द्वारा अमेरिका के जासूसी ड्रोन को मार गिराए जाने का। ईरान का दावा है कि अमेरिकी ड्रोन ईरानी हवाई क्षेत्र में मंडरा रहा था, जबकि अमेरिका ने इस दावे को खारिज कर दिया है। कुछ दिन पहले ही अमेरिका ने ईरान पर उसके इलाके में मौजूद तेल टैंकरों पर हमला करने का आरोप लगाया था। फिलहाल अमेरिकी ड्रोन को मार गिराने की दुस्साहसपूर्ण कार्रवाई ईरान की बढ़ी हुई तकनीकी और सामरिक क्षमताओं की ओर इशारा करती है। हालांकि अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान ने भी और ज्यादा दुस्साहसी कार्रवाई करने का फैसला कर लिया था, जिसके तहत कुछ ईरानी ठिकानों पर बम बरसने वाले थे, लेकिन बिलकुल आखिरी क्षणों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपना इरादा बदलकर तात्कालिक तौर पर दुनिया को युद्ध से बचा लिया। हालांकि वे अपने इस इरादे पर कब तक कायम रहेंगे, यह कहना मुश्किल है, क्योंकि उनका बयान आया है कि अमेरिका को कोई जल्दी नहीं है। ट्रंप ने यह भी कहा है कि दुनिया की सबसे बेहतरीन उनकी सेना हर चुनौती का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है। करीब दो महीने पहले भी ट्रंप ने ईरान को पूरी तरह बर्बाद करने की धमकी देते हुए कहा था कि अगर युद्ध हुआ तो ईरान का औपचारिक तौर पर अंत हो जाएगा।