सांस्कृतिक जागरण के नायक स्वामी विवेकानंद
   Date11-Jan-2020

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धर्मधारा
स्वामी विवेकानंद ने पेरिस और लंदन की यात्रा की। कनाडा सहित पश्चिम के कई अन्य देशों की भी यात्रा की। यूरोपीय देशों में भी भ्रमण किया। साथ ही वियना, हंगरी, कुस्तुनतुनिया, ग्रीस, मिस्र आदि देशों की भी यात्रा की। कोलंबो से अल्मोड़ा तक की उनकी यात्रा अन्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। पूरे भारत की उन्होंने पैदल यात्रा की थी। रोमां रोलां ने उनके बारे में कहा था, 'उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असंभव है। वे जहां भी गए, सर्वप्रथम हुए। हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी। हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देखकर, ठिठककर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा, 'शिव!Ó यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो।Ó कोलकाता में 1 मई 1897 को स्वामीजी ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। विवेकानंद की यात्रा से पूरी दुनिया ने भारत के असली स्वरूप को पहचाना। सामाजिक और सांस्कृतिक जागरण का शंखनाद कर उन्होंने हरेक सभ्यता का विश्लेषण किया। भारत के नवजागरण के विहान का संकेत देकर स्वामी विवेकानंद 4 जुलाई 1902 को महासमाधि में चले गए। 25 वर्ष की अवस्था में नरेन्द्र ने गेरुआ व धारण कर लिया था। उसके बाद उन्होंने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की थी। वर्ष 1893 में अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म की परिषद् हो रही थी, जहां सभी देशों ने धर्मावलंबियों के प्रतिनिधि मौजूद थे। स्वामी विवेकानंद उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप में पहुंचे। यूरोपीय देश और अमेरिका के लोग उस समय पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे। वहां के लोगों का प्रयत्न यही था कि स्वामी विवेकानंद को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का समय ही न दिया जाए। एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा सा समय दिया गया, लेकिन स्वामीजी के विचार सुनकर सभी चकित हो गए। तीस वर्ष की आयु में स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन में हिन्दू धर्म और संस्कृति को सार्वभौमिक पहचान दिलवाई थी। अमेरिका से लौटे और गुलामी की बेडिय़ों को काटने के लिए देशवासियों का आव्हान करते हुए कहा एक नवीन भारत निकल पड़े-हल पकड़कर, किसानों की कुटी भेदकर, मछुए, माली, मोची, मेहतरों की कुटीरों से...निकल पड़े बनियों की दुकानों से, भड़भूजें के भांड़ से, कारखानों से, हाट से, बाजार से...,निकल पड़े झाडिय़ों से, जंगलों से, पहाड़ों से, पर्वतों से, कन्दराओं और गुफाओं से। ये कहा जा सकता है कि देश की जनता ने स्वामीजी की पुकार सुन ली थी।