तिब्बत में चीन की कुटिल चालें...
   Date10-Jan-2020

vishesh lekh_1  
धार्मिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक संपदा के मान से सम्पन्न माने जाने वाले चीन को विश्व हमेशा से एक सांझी छत के रूप में देखता रहा है... क्योंकि यहां की संस्कृति ने अपना प्रभाव विश्व में अनेक देशों तक स्थापित भी किया, लेकिन यह चीन के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब से चीन ने तिब्बत पर कब्जा जमाया या उसे गुलाम बनाया, तब से उसकी संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों को नष्ट-भ्रष्ट करने का खेल चीन ने निरंतर खेला है... चीन के लिए तिब्बत हमेशा से भारत पर हमलावर होने के मान से बहुत मुफीद माना जाता है... तभी तो वह हर कीमत पर तिब्बत पर अपना शिकंजा कसे रखना चाहता है... जिस तरह से चीन के हाथों से आज हांगकांग तेजी से फिसल रहा है, उसी तरह का आजादी प्राप्त करने वाला आंदोलन तिब्बत में भी चीन के खिलाफ दशकों से चल रहा है... इस कार्य में भारत में निर्वासित जीवन बिता रहे तिब्बती लोग भी बड़ी भूमिका का निर्वाह करते हैं... क्योंकि उत्तराखंड के धर्मशाला में बकायदा निर्वासित तिब्बतियों की संसद भी संचालित हो रही है... लेकिन जिस तरह से हांगकांग के मामले में चीन बेनकाब हुआ और हो रहा है, वैसा तिब्बत में हिंसक रक्तपात के मामले में नहीं हो पाया... क्योंकि उसका मीडिया पर प्रतिबंधित खेल वहां के मानवाधिकार हनन को सामने ही आने नहीं देता... इसलिए चीन बड़े स्तर पर तिब्बत में अपनी कुटिल चालें भारत के खिलाफ चल रहा है... चीनी सेना का वर्तमान में तिब्बत में बड़ा सैन्य अभ्यास भी इसी की कड़ी है...
भारत का रक्षा मंत्रालय पहले ही स्वीकार कर चुका है कि चीन, लद्दाख से सटे सीमावर्ती इलाकों में बुनियादी ढांचे को बड़े पैमाने पर बनाने/बढ़ाने की तैयारी में जुटा है... चीन की पीपुल्स लिबरेशन ऑर्मी (पीएलए) लद्दाख क्षेत्र में पंैगोंग झील से सटे इलाके में टेंट स्थापित करके अनेक भूमिगत सुरंगों को अंतिम रूप देने में जुटी है... पैंगोंग त्सो क्षेत्र के पास विवादित फिंगर 8 माउंटेन स्पर में और अधिक सुरंगों का निर्माण चीनी सेना कर रही है... ये कुछ ऐसी तैयारी है, जो चीन का तिब्बत में मजबूती से कदम जमाने के रूप में देखा जाना चाहिए... क्योंकि फिलहाल उसके वहां पर पैर उखडऩे के संकेत मिल रहे हैं... क्योंकि नए दलाईलामा का चयन जो होना है... उसके बाद तिब्बत में चीन से आजादी पाने की आंदोलनकारी लड़ाई नया रूप ले सकती है... उसके पहले ही चीन तिब्बत में अपनी साजिशन जमावटों को अंजाम दे रहा है... तिब्बत में चीन की सेना द्वारा बड़े युद्धाभ्यास के जरिए विश्व को यह संदेश देने की कोशिश है कि यह उसी का ही क्षेत्र है... तभी तो वह तिब्बत सीमा पर हल्के युद्ध टैंक टाइप-15 और 155 एमएम वाहन चलित होवित्जर तोप जैसी नई हथियार प्रणाली को भी तैनात करने में जुटा है... इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत और चीन की वास्तविक नियंत्रण रेखा 3,488 किलोमीटर लंबी है... जो अरुणाचल और सिक्किम तक से मिलती है... और चीन की खुराफात यहां पर भी यह रही है कि वह हमेशा से अरुणाचल पर अपना दावा जताकर अरुणाचलप्रदेश को दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताने की गुस्ताखी अनेकों बार कर चुका है... तिब्बत हर लहजे से भारत के लिए भरोसेमंद रहा, लेकिन फिलहाल चीनी शिकंजे से मुक्त होने की उसकी छटपटाहट और ऊपर से चीन द्वारा उस पर अनेक प्रकार के हिंसक दबाव सारी स्थिति को विकट बना रहे हैं... जिसे विश्व को देखना चाहिए...
दृष्टिकोण
पूर्वोत्तर में विकास का नया सवेरा...
केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने बुधवार को अपने मंत्रिमंडल फैसले में अनेक निर्णायक मुद्दों/विषयों पर मुहर लगाई... सबसे आवश्यक कदम या निर्णय जो मोदी मंत्रिमंडल ने उठाया, वह यही माना जाना चाहिए कि पूर्वोत्तर में विकास का नया सवेरा होने वाला है... क्योंकि पूर्वोत्तर के 8 राज्यों में गैस ग्रिड तैयार करने का फैसला किया गया है... केन्द्र सरकार पूर्वोत्तर क्षेत्र में 9,265 करोड़ रुपए की लागत से तैयार हो रही 1,656 किलोमीटर लंबी गैस ग्रिड के निर्माण के लिए 5,559 करोड़ रुपए की वित्तपोषण सुविधा प्रदान करेगी... अब विचार किया जा सकता है कि जब यह कार्य धरातल पर आकार लेगा तो पूर्वोत्तर को विकास का एक नया उजाला सम्पन्नता का मार्ग प्रशस्त करने का कारण बनेगा... फिलहाल पूर्वोत्तर में भाजपा या तो अपने बूते या फिर सहयोगी के जरिए सरकार में है... जिसके चलते राज्य में परिवहन व्यवस्था, सड़क, बिजली, पानी और रेलवे योजनाओं का तेजी से विकास हुआ है... पहली बार पूर्वोत्तर को अहसास हुआ कि आजादी के बाद कोई सरकार उसके विकास और उत्थान के लिए कृतसंकल्पित नजर आ रही है... इस मान से देखें तो पूर्वोत्तर के लिए जो गैस ग्रिड मंजूर हुई है, वह अनेक स्तर पर न केवल रोजगार का सृजन करेगी, बल्कि लोगों के विकास के साथ ही उद्योग स्थापना एवं सतत् संपर्क व संवाद का आधार भी बनेगी... जब पूर्वोत्तर में बुनियादी एवं प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति का सिलसिला यूं ही निरंतर चलेगा, तो नया सवेरा होना तय है...