भावी वृक्ष का मूल
   Date10-Jan-2020

prernadeep_1  H
प्रेरणादीप
ए क छोटे से गाँव में एक सौ घरों की आबादी थी। उस गाँव में आए एक संन्यासी सुबह से शाम तक गाँव के रास्ते साफ करना, अशिक्षितों को पढ़ाना, बीमारों की दवा करना, वृद्धों व अपंगों की सहायता करना और कथा-कहानी सुनाने में लगे रहते थे। उस गाँव के अज्ञानी लोग इस काम की कोई कीमत न जानकर उसकी कदर नहीं करते थे। एक बार उस गाँव में सुशिक्षित कार्यकर्ता आया। उस साधु से चर्चाकर वह जान गया कि संत काशी नगर के संस्कृत का महान विद्वान है। ऐसी महान विभूति इस छोटे से गाँव में सड़ती रहे, इसका उसे आश्चर्य हो रहा था। वह युवक बोला - महाराज! आप जैसी प्रतिभा को तो देश-विदेश में जाकर भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना चाहिए। यहाँ कहाँ गाँव में पड़े हैं? संत बोले - बेटा! देश में ऐसे मनुष्यों की कमी नहीं है। कमी है तो धूल में डट जाने की इच्छा रखने वालों की। चतुर्दिक कीर्ति फैलाने की इच्छा रखने वाले तो बहुत हैं, मगर धूल में दबकर भावी वृक्ष के विकास में मूल बनकर जीने वालों की कमी है। जमीन में दबकर अपेक्षा रहित हो वृक्ष को पोषण पहुंचाने वाले बिरले ही होते हैं। वृक्ष को फैलाने के लिए मूल ही चाहिए। मैं ऐसा ही मूल बनना चाहता हूँ। कभी तो उससे वट वृक्ष बनेगा। युवक को अब तक उनका निरर्थक लगने वाला जीवन वास्तविक और सार्थक नजर आने लगा।