शरणार्थी और घुसपैठियों का अंतर समझना जरूरी
   Date10-Jan-2020

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संतोष तिवारी
आ प सभी जानते होंगे भारतीय संसद ने नागरिकता कानून में संशोधन किया और इसके साथ ही माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर गृह मंत्रालय ने 'राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टरÓ के माध्यम से भारत में नागरिकों के बीच छुपे घुसपैठियों की पहचान करने की ओर कदम बढ़ाना शुरू किया है। भारत के तथाकथित बुद्धिजीवियों और वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित राजनीतिज्ञों ने आम जनता के बीच इन दोनों विषयों पर भ्रान्ति फैलाना शुरू कर दिया। वे आम जनता के बीच विदेशी घुसपैठियों, विशेषकर बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों के पक्ष में सहानुभूति का भाव जगाने की कोशिश कर रहे हैं। विदेशी घुसपैठियों की छवि 'सताए हुएÓ लोगों के समूह के रूप में बनाने की कोशिश की जा रही है।
भारत की पूर्वी सीमा पर शरणार्थियों के रूप में घुसपैठ सन् 1970 से ही व्यापक पैमाने पर हो रही है। एक अनुमान के अनुसार लगभग 5 करोड़ से अधिक बाँग्लादेशी भारत में अवैध रूप से रह रहे हैं। जहां एक तरफ ये देश के सीमित संसाधनों पर बोझ बन चुके हैं, वहीं दूसरी तरफ ये राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में भी चिंता का कारण हैं। पश्चिम बंगाल, असम और पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में इन घुसपैठियों ने जनसंख्या का संतुलन बिगाड़ दिया है। अशिक्षा, मजहबी उन्माद और बेरोजगारी के कारण ये समाज में कानून व्यवस्था के लिए सिरदर्द बन गए हैं। इस्लाम के मूल सिद्धांत - 'एको अहम द्वितियो नास्तिÓ के कारण इस मजहब को मानने वाले जहाँ भी बहुसंख्यक हो जाते हैं, वहां अन्य लोगों को सामान्य जीवन जीना दूभर कर देते हैं। हिन्दुओं को दुर्गा पूजा और विसर्जन के लिए मुस्लिम संगठनों और प्रशासन की अनुमति लेनी पड़ती है और कड़ी सुरक्षा के बाद भी भय के माहौल में हिंसा और पथराव का सामना करना पड़ता है। अभी नागरिकता संशोधन कानून के पास होने के बाद सबसे अधिक हिंसा प. बंगाल के मुर्शिदाबाद और मालदा इलाकों में हुई। दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया और उत्तरप्रदेश के अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में उग्र और हिंसक प्रदर्शन हुए। बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्या घुसपैठियों ने स्थानीय मुस्लिम समुदाय के लोगों के साथ मिलकर दर्जनों रेलवे स्टेशन और रेल गाडिय़ों को आग लगा दी, पटरियां उखाड़ दी और सरकारी संपत्ति को अपूरणीय छति पहुंचाई। आप पूछेंगे बंगाल में ही इतना उपद्रव क्यों? और राज्य सरकार ने कड़ाई से हिंसा को कुचलने का प्रयास क्यों नहीं किया? आइये इसे समझने की कोशिश करते हैं। इसका मूल कारण है। जनसंख्या जिहाद उपरोक्त बात को समझने के लिए राज्यों के आंकड़ों का विश्लेषण करते हैं। पहला असम-पूर्वोत्तर के इस राज्य में आजादी के बाद से मुस्लिम आबादी का प्रतिशत 16 से बढ़कर 35 प्रतिशत हो गया है। राज्य के 124 विधानसभा क्षेत्रों में से लगभग 40 मुस्लिम बहुल हो गए हैं। नेशनल सिटीजनशिप रजिस्टर (एनआरसी) के द्वारा लगभग 40 लाख लोगों की अकेले असम में ही घुसपैठियों के रूप में पहचान की गयी है। इसी प्रकार 1947 में बंटवारे के समय पश्चिम बंगाल में कुल मुस्लिम आबादी, कुल जनसंख्या का 19 प्रतिशत थी और आज यह बढ़कर कुल जनसंख्या का 32 प्रतिशत के करीब है। राज्य की कुल 294 विधानसभा सीटों में से 85 विस क्षेत्रों में 30 प्रतिशत से ज्यादा मुस्लिम आबादी है। = मुर्शिदाबाद में 66.3 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। इस क्षेत्र के अंतर्गत 22 विधानसभा सीटें आती हैं। = मालदा में 12 विधानसभा सीटें आती हैं और यहां मुस्लिम आबादी 51.3 प्रतिशत है। = उत्तर दीनाजपुर क्षेत्र में मुस्लिम आबादी 49.9 प्रतिशत है। इस क्षेत्र में 9 विधानसभा सीटें आती हैं। = बीरभूम में मुस्लिम आबादी 37.1 प्रतिशत है। इस क्षेत्र में 11 विधानसभा सीटें हैं। = दक्षिण 24 परगना में मुस्लिम आबादी 35.6 प्रतिशत है। इस क्षेत्र में 31 विधानसभा सीटें आती हैं। अर्थात् हर मौका परस्त राजनीतिक दल को बंगाल में सरकार बनाने के लिए सबसे आसान वोट बैंक मुस्लिम ही दिखते हैं, और यहां से तुष्टिकरण और गैर वाजिब मांगो का सिलसिला शुरू होता है। पर सवाल उठता है कि क्या घुसपैठिये सच में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं? उत्तर है बिलकुल। कश्मीर में पाकिस्तान से घुसपैठ के जरिये आए कबायली और पश्तून लोगों ने बलात्कार, हत्या और आगजनी से खौफ फैला कर घाटी में रहने वाले कश्मीरी पंडितों को पलायन के लिए मजबूर कर दिया। इसी तरह बंगाल. असम, उत्तर प्रदेश के कैराना, दिल्ली के पास मेवात इत्यादी इलाकों से अल्पसंख्यक हिन्दू बड़ी संख्या में पलायन कर चुके हैं और यह पलायन अब भी जारी है। ध्यान रहे, आतंक सिर्फ बम विस्फोटों या नरसंहार के द्वारा ही नहीं फैलाया जाता है, बल्कि घुसपैठ, बलात्कार, आगजनी,पथराव आर्थिक बहिष्कार, फिरौती, अपहरण और नृशंस हत्याओं के जरिये भी आतंक अपने मकसद की ओर बढ़ता है।
हर देश और समाज को इतिहास से सीख लेनी चाहिए। भारतीय समाज में घुसपैठ के जरिये आतंक का सबसे प्रखर उदाहरण है, ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती। कट्टर मुस्लिम मौलाना मोइनुद्दीन चिश्ती 1192 में अजमेर में एक सूफी संत के छद्म वेश में आए। तत्कालीन हिन्दू समाज ने उनके गिरोह को अजमेर में शरण दी। राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान ने कुछ वर्ष पहले ही मुहम्मद गोरी को युद्ध में बुरी तरह से हराया था। इतिहास गवाह है कि मोइनुद्दीन चिश्ती और उनके गिरोह ने पृथ्वीराज के राज्य, सेना, कमजोरियों और लापरवाहियों के बारे में मुखबिरी कर मुहम्मद गोरी को उचित समय पर फिर निमंत्रण दिया। ऐसे समय पर जब राजा पृथ्वीराज विवाह के बाद अपने वैवाहिक जीवन में व्यस्त थे और परिणाम राजपूतों की हार और उसके बाद हिन्दुओं की हत्या, बलात्कार, धर्म परिवर्तन और गुलामी का नृशंस खेल, जिसमें ख्वाजा मोईनुद्दीन और उनके गिरोह ने खुलकर भाग लिया। इतिहास में दूसरा उदाहरण है, पानीपत की तीसरी लड़ाई (14 जनवरी 1761) में मराठों के खिलाफ लडऩे के लिए अवध के नवाब शुजाउद्दौला और रोहिला पठानों नजीबुद्दौला जैसे घुसपैठियों ने अफगानी लुटेरे अहमद शाह अब्दाली का साथ दिया था। मराठा सम्राट ने अवध और रोहिला पर विजय पाने के बाद अवध/रोहिला को मराठा साम्राज्य में जागीर के रूप में मिला लिया था, पर इन घुसपैठियों को गद्दी पर बने रहने दिया और नतीजा पानीपत में मराठा सेना की हार और बाद में नरसंहार के रूप में हुआ। अगर हम भारत से बाहर घुसपैठियों या शरणार्थियों के आतंकवाद के प्रसार में भूमिका देखें तो मध्य पूर्व का एक सुन्दर देश लेबनान सटीक उदाहरण है। 1920 से 1948 तक फ्रांस के उपनिवेश के रूप में लेबनान एक बड़ा ही सुंदर और आधुनिक समाज के रूप में जाना जाता था। 1948 में अरब इजराइल युद्ध के बाद फिलिस्तीन से लगभग 100,000 शरणार्थी लेबनान आ कर बस गए, जिन्हें इजराइल ने कभी फिलिस्तीन वापस नहीं आने दिया। इसके बाद वहाँ शिया आतंकी संगठनों विशेष कर 'हिज्बुल्लाÓ का जोर बढऩे लगा। मजहबी उन्माद का ये आलम रहा कि लेबनान दुनियां में आतंकवाद की सबसे बड़ी पनाहगार धरती के रूप में जाना जाने लगा। वहां की धरती, इजरायल और अन्य देशों में आतंकी हमलों की योजना बनने और क्रियान्वयन में उपयोग होने लगी। जैसे-जैसे फिलिस्तीनी शरणार्थियों के समूहों की ताकत बढ़ती गई, लेबनान गृहयुद्ध की चपेट में आ गया। 1975 से 1990 के बीच 16 वर्षों तक चले गृहयुद्ध में 150,000 से ज्यादा लोग मारे गए, लाखों घायल हुए और 15 लाख से ज्यादा लोगों को घरबार छोड़ कर भगाना पड़ा। यही नहीं लेबनान की धरती पर कार बम विस्फोटों की घटनाएं आम हो गई। दो-दो लेबनानी प्रधान मंत्री बशीर गमायल (1982) और रफीक हरीरी (2005) भी ऐसी ही आतंकी घटनाओ में मारे गए। 18 वीं सदी का लेबनान क्रिश्चियन बहुल था, पर लगातार घुसपैठियों के आगमन और जनसंख्या जिहाद की देन है कि आज क्रिश्चियन कुल जनसंख्या का 40 प्रतिशत से कम रह गए हैं।