भव बन्धन से मुक्ति का सूत्र श्रीमद् भगवद गीता
   Date10-Jan-2020

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धर्मधारा
(गतांक से आगे)
य हि उपदेश गीता में अर्जुन के माध्यम से संसार को देना चाहा है कि ज्ञानी पुरूष दिव्य ज्ञान की अग्नि से शुद्ध होकर बाह्यत: सारे कर्म करता है, किन्तु अन्तर में उन कर्मों के फल का परित्याग करता हुआ शान्ति, विरक्ति, सहिष्णुता, आध्यात्मिक दृष्टि तथा आनन्द की प्राप्ति करता है। आज मानव को इन सबकी आवश्यकता है। मानव में देवी व आसुरी स्वभाव देखने को मिलता है। शास्त्रों का पालन न करके मनमाने ढंग से जीवन व्यतीत करने वाले तथा आसुरी गुणों वाले व्यक्ति अधम योनियों को प्राप्त होते है और आगे भी भव बंधन में पड़े रहते है, किन्तु दैवी गुणों से सम्पन्न तथा शास्त्रो को आधार मानकर नियमित जीवन बिताने वाले लोग आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त करते है। गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन के माध्यम से संसार वासियों को वैराग्य का अर्थ और मानवीय चेतना तथा कर्म पर प्रकृति का प्रभाव समझाते है। आज से लगभग 5200 वर्ष पूर्व भगवान श्रीकृष्ण ने अपने मित्र तथा भक्त अर्जुन को भगवान गीता का उपदेश दिया था। भगवान कृष्ण कोई सामान्य व्यक्ति नहीं अपितु साक्षात् परम ईश्वर के अंश है। जिन्होनें इस धराधाम में अवतरित होकर 6 गर्म पारायण पाण्डव पुत्रों का पक्ष लेकर उनकी रक्षा की थी। स्वयं कृष्ण अर्जुन के सारथी बने और उन्होने उस सुप्रसिद्ध धनुर्धर का रथ हांकना स्वीकार किया।
आज मानव समाज में कृष्ण भावनामृत आन्दोलन अनिवार्य है क्योंकि यह जीवन की चरम सिद्धि प्रदान करने वाला है। दुर्भाग्य रहा भारत का कि कृष्ण ज्ञानामृत गीता को या तो उस समय पढ़ी जाती है जब कोई मरणासन्न स्थिति में तडफ़ रहा हो, मृत्यु नहीं आ रही है। दादा-दादी, नाना-नानी बहुत दु:ख भोग रहे, बिस्तर पर पड़े-पड़े कराह रहे हो। उनकी मृत्यु सुखमयी हो जाय उसे गीता सुनाते है। कोई मूक पशु, गाय, बैल, भैंस आदि तडफ़ रही हो, प्राण नहीं निकल रहे है, तब गीता पढ़ी जाती है। होना तो यह चाहिए गीता को हर घर में नित्य पढ़े। उसका ज्ञान व्यवहार में लाए। मोहवश मनुष्य विभिन्न प्रकारो से इन्द्रिय तृप्ति करके सुखी बनना चाहता है, किन्तु इससे वह कभी भी सुखी नहीं हो सकता। (समाप्त)
मनुष्य को भगवत गीता के उस केन्द्र बिन्दु को समझना होगा कि कोई भी व्यक्ति ईश्वर को पा सकता है। इसके लिए अत्यधिक विकसित बुद्धि की आवश्यकता नहीं है। जो कोई भक्ति योग के सिद्धान्त को स्वीकार कर कर्म को केन्द्र बना जीवन जीयेगा। वह भव बन्धन से छुट कर ब्रम्ह में अनुभूति कर मोक्ष पा लेगा। जीवन की सारी समस्याओं का स्थायी हल पाना है तो गीता को पढऩा, पढ़कर समझना व आत्मसात करना होगा। गीता शास्त्रमिंद पुण्य य: पढेत प्रयत: पुमान – यदि कोई भगवत गीता के उपदेशों का पालन करे तो वह जीवन के दुखो तथा चिन्ताओं से मुक्त हो सकता है। भय शोकादिवर्जित: - वह इस जीवन में सारे भय से मक्त हो जायेगा और उसका अगला जीवन आध्यात्मिक होगा।
गीता में परं का अर्थ परमात्मा है। इसे परिभाषित करते हुए गीता कहती है कि सारा विश्व ईश्वर ही है। वासुदेव: सर्वम् । यह भी कहा है कि मुझ ईश्वर को सब विश्व में व्याप्त जानों और मुझमें सम्पूर्ण विश्व को समझो। अर्थात् ईश्वर और विश्व अभिन्न है। अत: सबके प्रति सेवाभाव रखो। यही मन की वासनाओं की शुद्धि का सूत्र गीता देती है। यहि आमजन के लिये प्रेरणा और कर्तव्य का बोध गीता मानव मात्र को देती है। आज आवश्यकता है- अर्जुन ने जिस प्रकार से साक्षात भगवान श्रीकृष्ण से गीता सुनी और सुन कर उपदेश ग्रहण किया। इस प्रकार की स्पष्ट अनुभूति का उदाहरण गीता में है। यदि उसी गुरू परम्परा से निजी स्वार्थ से प्रेरित हुए बिना किसी को गीता समझने का सौभाग्य प्राप्त हो तो वह समस्त वैदिक ज्ञान में केवल अन्य शास्त्रो की सारी बातें मिलेगी। अपितु ऐसी बाते भी मिलेगी जो अन्यत्र कहीं उपलब्ध नहीं है। यही गीता का विशिष्ट मानदण्ड है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा साक्षात् उच्चरित होने के कारण यह पूर्ण आस्तिक विज्ञान है। परमात्म-धर्म का शुद्ध शास्त्र गीता है। गीता सार्वभौम है। विश्व के प्रत्येक मानव का कोई निर्दोष शास्त्र है तो वह गीता ही है। इति शुभम् भ्रूयात् ।