सत्य ईश्वरीय शक्ति
   Date09-Sep-2019

प्रेरणादीप
ब गदाद के संत हंबल वंदी बने खलीफा के न्यायालय में खड़े थे। उनका मन बारबार शासन की क्रूरता के विषय में सोच रहा था। वे बड़े असमंजस में थे कि तभी द्वार पर पहरा देने वाले सिपाही ने आकर उनके कान में कहा- 'हजरत! आज सच्ची वीरता दिखाने का दिन है और आप असमंजस में पड़े हुए हैं। मुझे आश्चर्य है कि आप पर कुरान का अपमान करने का आरोप लगाया गया है, जबकि आपने सारा जीवन कुरान की शिक्षाओं पर चलने में लगा दिया है। आप जैसे महापुरुष की तो पूजा होनी चाहिए थी; जबकि उसके विपरीत कैदी बनाकर आपको उपस्थित किया गया है। एक बार मैंने चोरी की तो खलीफा ने हजार कोड़ों की मार की सजा सुनाई थी। मैं सचमुच चोर था, परंतु अपनी जिद पर डटा रहा और हजार कोड़ों की मार सहकर भी मैंने उस चोरी के रहस्य को न खुलने दिया। आखिरकार मुझे छोड़ दिया गया। जब मैं झूठ के लिए अपने कलेजे को इतना मजबूत कर सकता था तो आप सत्यपालन के लिए इतना सशंकित क्यों होते हैं? संत के मन पर छाई आशंका की लहरें छंटने लगीं। उन्हें अंधकार में प्रकाश की किरण दिखाई देने लगी। वे बोले- 'सचमुच तुम ठीक ही कहते हो। तुमने समय पर मुझे जगा दिया। इसके लिए मैं सदैव तुम्हारा आभारी रहूँगा।Ó दूसरे ही क्षण संत ने खलीफा के न्यायालय में धर्मांधों के रोष का बहादुरी से सामना करने के लिए अपने को समर्थ पाया। दूसरे दिन खलीफा द्वारा पूछे गए सारे प्रश्नों का संत ने सही-सही उत्तर दे दिया। वे पहले ही सोच चुके थे कि अधिक-से-अधिक मृत्युदंड ही दिया जा सकता है। उनकी आँखों में उपस्थित निर्भयता को देखकर क्रूर खलीफा का मन भी काँप उठा। उसे भी लगने लगा कि संत के भीतर किसी ईश्वरीय चेतना का वास है।