बाढ़ की विभीषिका से बचने का एकमात्र उपाय बांध
   Date09-Sep-2019

सुविज्ञा जैन
मा नसून के तीन महीने गुजर चुके हैं। सरकारी विभाग बता रहे हैं कि इस साल अब तक बारिश अच्छी हुई है। हालांकि महीने भर पहले कम वर्षा का अंदेशा खड़ा हो गया था। लेकिन जुलाई-अगस्त के कुछ हफ्तों में देश में जम कर बारिश हुई और जून में वर्षा की घटोतरी पूरी हो गई। यहां तक कि अपने बांधों में जो बेशकीमती पानी संजो कर रखा था उसे भी निकाल कर बहाना पड़ा। अचानक ज्यादा पानी आने से बांध टूट न जाएं, इसलिए उनसे पानी खारिज करना जरूरी होता है। बहरहाल, अगस्त के आखिरी दिन तक की स्थिति यह है कि सरकारी मौसम विभाग देश में सामान्य वर्षा के आंकड़े दिखा रहा है। लेकिन क्या हमें ये आंकड़े देख निश्चिंत होकर बैठ जाना चाहिए? बिल्कुल नहीं, क्योंकि पिछले साल भी सामान्य वर्षा के आंकड़े जारी हुए थे। फिर भी पिछले साल आधा देश सूखे की चपेट में आ गया था। यानी पिछला साल सिखा कर गया था कि सामान्य वर्षा से ही काम नहीं बनता।
वर्षा के पानी को रोक कर रखने के लिए बांध होते हैं। बांध आधुनिक काल का उपाय नहीं है, बल्कि दुनिया में बांधों के इस्तेमाल की परंपरा कम से कम पांच हजार साल पुरानी है। इसीलिए अब बांधों को समय-सिद्ध उपाय मान लिया गया है। देश में अगर पर्याप्त बांध होते तो इस साल जो पानी बाढ़ की तबाही मचाता हुआ वापस समुद्र में चला गया है, वह न जाता। पर्याप्त बांध होते तो बाढ़ की विभीषिका भी कम दिखाई देती और ज्यादा बांध होने के कारण जो ज्यादा पानी बांधों में जमा होता, वह आने वाले आठ महीनों तक सिंचाई और पीने के लिए काम आता। यानी सूखे का अंदेशा भी कम हो जाता।
वैसे तो जल प्रबंधन पर हर साल और लगभग हर महीने किसी न किसी बहाने बात होती ही है। पिछले एक पखवाड़े में देश के ज्यादातर राज्यों ने बाढ़ का प्रकोप झेला है। यही वह समय है जब हमें अपने जल प्रबंधन के इतिहास पर भी नजर डाल लेनी चाहिए। हमें याद रखना चाहिए कि आजादी के बाद बड़ी संख्या में बांध बनाने का काम शुरू किया गया था। इधर साल दर साल देश पानी की कमी झेलने लगा है। लेकिन नए बांध बनाने की बातें रुक गई हैं। क्यों रुक गईं? इसकी तह में जाने के लिए आर्थिक और राजनीतिक कारणों को ईमानदारी से देखना पड़ेगा।
आज देश में लगभग पांच हजार से ज्यादा बड़े और मझोले बांध हैं। इन बांधों से देश में खेती की लगभग आधी जमीन तक हम सिंचाई के लिए पानी पहुंचा पा रहे हैं। इन बांधों के कारण काफी कुछ पनबिजली भी बन रही है। इसीलिए बांधों की भूमिका बाढ़ और सूखा प्रबंधन के अलावा भी बेहद महत्वपूर्ण है। बांध-विरोधियों के तर्क अपनी जगह हैं। चाहे विस्थापितों के पुनर्वास का मसला हो या बड़े बांधों पर खर्च की समस्या हो या फिर अविरल धारा और निर्मल धारा के नुक्ते हों, इन सारे पहलुओं पर पक्के तौर पर निर्णय आज तक नहीं हो पाया। लेकिन इतना जरूर है कि बांधों का व्यावहारिक विकल्प कोई नहीं सुझा पाया। पारंपरिक जल प्रबंधन के तौर-तरीकों पर तालाबों की चर्चा जरूर गाहे बगाहे उठती रहती है लेकिन इस बारे में कोई ठोस नीति या कार्यक्रम सामने आता नहीं दिखा। मसलन, चार साल पहले देश में पांच लाख तालाब बनाने की योजना भी अपने योजना काल से लेकर आज तक कहां पहुंची, इसकी समीक्षा भी बहसबाजी में ही उलझ कर रह जाएगी।
बस, बड़ी हकीकत यही है कि आज जल संचयन का सबसे बड़ा जरिया हमारी आंखों के सामने है तो वे बांध ही हैं। बांधों के मामलों में अगर कोई कमी दिख रही है तो वह यह है कि आज अपनी जरूरत जितना वर्षा का पानी रोकने के लिए मौजूदा बांध कम पडऩे लगे हैं। कितने कम पडऩे लगे हैं, इसका हिसाब लगाना पेशेवर जल प्रबंधकों का काम है। फिर भी मोटा अंदाजा कोई भी लगा सकता है। मसलन, देश को हर साल वर्षा के रूप में प्रकृति से चार हजार अरब घनमीटर पानी मिलता है। इसमें से बारह सौ अरब घनमीटर पानी हमें इस्तेमाल के लिए उपलब्ध है और इस समय सारे बांधों की कुल क्षमता ढाई सौ अरब घनमीटर पानी ही रोक कर रखने की है। यानी अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि हमें उपलब्ध पूरे पानी को रोक कर रखने के लिए कितने और बांध चाहिए। इस समय तक देश में पांच हजार दो सौ बांध हैं। इनमें बड़े और मझोले दोनों प्रकार के बांध और जलाशय हैं। साल भर पुरानी एक रिपोर्ट बताती है कि कोई साढ़े चार सौ बांध निर्माणाधीन थे। लेकिन इन निर्माणाधीन बांधों की वर्तमान स्थिति के बारे में ज्यादा पता नहीं चलता। देश भर के बांधों पर निगरानी का काम केंद्रीय जल आयोग करता है लेकिन निगरानी का यह काम सिर्फ एक सौ सात बांधों तक सीमित है। आयोग ही यह हिसाब रखता है कि मानसून के दौरान हर हफ्ते इन बांधों में कितना पानी भरा। आयोग यह भी बताता चलता है कि पिछले साल उसी हफ्ते बांधों में कितना पानी भरा था, पिछले दस साल में औसतन उस हफ्ते कितना पानी जमा होता आया है। इससे पता चलता रहता है कि मानसून के बाद जरूरत के लिए बांधों में जमा पानी की स्थिति क्या है। देख लेना चाहिए कि इस साल बांधों में पानी जमा होने के मामले में आयोग का दावा क्या है। बांध सिर्फ पानी की जरूरत पूरी करने के काम नहीं आते। इनसे बाढ़ प्रबंधन का भी काम होता है। बाढ़ प्रबंधन के लिए बांध एकमात्र उपाय माने जाते हैं। इस बात पर गौर होना चाहिए कि इस साल देश ने जैसी बाढ़ की विभीषिका झेली है, वह सिर्फ प्राकृतिक कारणों से नहीं झेली है, बल्कि इसका एक कारण लचर बांध प्रबंधन भी रहा है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल जैसे कई राज्यों में बांध प्रबंधकों ने मौसम विभाग के अनुमान जारी होने के बावजूद सही समय पर बांध से अतिरिक्त पानी नहीं निकाला। देश में कई जगह पानी छोडऩे से पहले बांध के पूरा भरने का इंतजार किया गया और जिस समय तेज बारिश से इन क्षेत्रों में पहले से ही जलभराव और बाढ़ की स्थितियां बन रही थीं, उस समय बांधों से पानी छोडऩा पड़ा। इससे बाढ़ ने और विकराल रूप ले लिया। यह आमतौर पर सिर्फ इस लालच में होता है कि मानसून के आखिर तक बांध पूरे भरे दिखाई दें। बहरहाल, ये स्थितियां बता रही हैं कि बांध प्रबंधन के लिए भी देश में प्रशिक्षित प्रबंधकों की दरकार है। दरअसल, जल प्रबंधन का काम इस समय उन अभियंताओं के हाथ में है जो सार्वजनिक निर्माण कार्य के लिए प्रशिक्षित किए जाते हैं। अब तक का चलन यह है कि प्रदेशों के सिंचाई विभाग या नहर विभाग के पेशेवर अभियंता ही जल प्रबंधन का काम देखते हैं। केंद्रीय जल आयोग हो या जल प्रबंधन से जुड़े दूसरे संस्थान हों, लगभग सभी में यह काम सार्वजनिक निर्माण में प्रशिक्षित अभियंताओं के जिम्मे ही है। क्या हमें एक बार देख नहीं लेना चाहिए कि देश में जल जैसे सबसे महत्त्वपूर्ण संसाधन के प्रबंधन के लिए और किन-किन पेशेवरों को लगाने की जरूरत है। जल संकट की अबूझ पहेली समझने के लिए क्या हमें बांधों के बारे में नए सिरे से एक बहस शुरू नहीं कर देनी चाहिए। बहस चलेगी तो हो सकता है कि बांधों का कोई विकल्प भी सूझ जाए। वरना बांधों की संख्या बढ़ाने का एक विकल्प तो हमारे पास है ही।