३० गुना जुर्माने के बोझ का दर्द
   Date07-Sep-2019

व्यवस्थाएं संचालित करने के कानून होते है। कानून के शासन का अर्थ यही है कि लोग स्थापित कानूनों का पालन करे। शासन-प्रशासन और पुलिस की व्यवस्था भी कानून के उल्लंघन को रोकने के लिए है। जो कानून का पालन नहीं करता, उसके लिए दंड का प्रावधान है। सीआरपीसी, आईपीसी में अपराधों के लिए दंड का प्रावधान है। न्यायालय अपराध का सत्यापन कर सजा निर्धारित करते है। कानून सबके लिए है, कानून के सामने सब बराबर है। यदि स्थापित कानूनों को मानने से कोई नकारा कर दे या कानून को मानने से जनता इंकार कर दे तो फिर अराजक स्थिति का सामना करना पड़ेगा। पूर्व गृह एवं वित्त मंत्री चिदंबरम को मनीलंाड्रिंग एवं आईएनएक्स मीडिया मामले में कोर्ट ने आगामी 19 सितंबर तक तिहाड़ जेल भेज दिया। चाहे कितना ही प्रभावशाली व्यक्ति हो, लेकिन अपराध किया है तो दंड मिलेगा। यह भी सच्चाई है कि कई कानूनों की प्रासंगिकता समाप्त हो गई है, उनमें बदलाव करना चाहिए। कानून जब असुविधा या प्रक्रिया में उलझन पैदा करते है तो उन्हें बदलना होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी कहा है कि वे हर दिन अनावश्यक एक कानून को बदलने -बदलाने की कार्यवाही करते है। कानून उलझनें पैदा करने के लिए नहीं होते, कानून होते है उलझनें दूर करने के लिए। जितना संगीन अपराध होता उसके लिए उतना ही कठोर कानून है। महिलाओं के साथ दुष्कर्म और माबलिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या) पर कठोर दंड देने का कानून बनाने की मांग होती रही है। दुष्कर्म के मामले में मृत्युदंड की भी सजा हुई है। इसी तरह ट्रॉफिक के नियम, मोटर व्हीकल एक्ट है, लेकिन ट्रॉफिक नियमों का उल्लंघन अक्सर होता है। केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि हर वर्ष देश में पांच लाख सड़क हादसे होते हैं, इनमें डेढ़ लाख लोगों की मौत होती है। सरकार चाहती है कि दुर्घटनाएं कम हो ताकि लोगों की जान बच सके। नए कानून के बाद लोगों की ट्रॉफिक नियमों के प्रति जागरूकता बढ़ी है। उन्होंने यह भी कहा कि लोग कानून का पालन शुरू कर देंगे तो जुर्माने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। उल्लेखनीय है कि एक सितंबर से लागू संशोधित मोटर वाहन में ट्रॉफिक नियम तोडऩे पर जुर्माना तीस गुना बढ़ा दिया है। इस भारी जुर्माने से कई लोगों को रोटी-रोजी के लाले पड़ गए है।
दृष्टिकोण
क्या खाएं-क्या कमाएं ?
अब सवाल यह है कि तीस गुना जुर्माना बढऩे से कई गरीब वाहन चालकों में भारी भरकम जुर्माने चुकाने की स्थिति नहीं है। उदाहरण के लिए दस्तावेज नहीं मिलने पर ट्रेक्टर का जुर्माना 59 हजार, ऑटो का 47 हजार और दो पहिया वाहन का 35 हजार रु. तक चालान काटा गया। ट्रेक्टर का उपयोग किसान करते है, ऑटोरिक्शा भी गरीब चलाते है। यदि इतना भारी जुर्माना देना पड़ेगा तो कई तो रोजगार छिन जाने से कंगाल हो जाएंगे। सामान्य बोली में कहें तो वह क्या खाए और क्या कमाए। ऐसी स्थिति से बचने के लिए कुछ रियायतें देने पर विचार होना चाहिए। कई सुधार से बिगाड़ की स्थिति पैदा हो जाती है। इस भारी जुर्माने के व्यवहारिक पहलुओं पर भी विचार होना चाहिए। यह भी सच्चाई है कि कानून का भय होना जरूरी है। गडकरी ने कहा है कि लोगों को गलतफहमी हो रही है कि इसका मकसद जुर्माना एकत्रित करना नहीं है, यह कानून इसलिए लाना पड़ा, ताकि लोग ट्रॉफिक नियमों को गंभीरता से लें और उनका उल्लंघन न करे। उन्होंने इस संदेह को दूर किया कि पेट्रोल-डीजल के वाहन प्रतिबंधित करने का कोई इरादा नहीं है। सरकार बिजली एवं वैकल्पिक ईधन से चलने वाले वाहनों के उपयोग को बढ़ावा दे रही है। क्योंकि देश पर पेट्रोलियम आयात पर सात लाख करोड़ रु. सालाना बोझ पड़ता है। इसके साथ ही प्रदूषण भी होता है। मोटर वाहन (संशोधन) कानून 2019 में सड़कों की खराब गुणवत्ता और डिजाइन के कारण होने वाले हादसों के लिए निर्माता कंपनी ठेकेदार को जिम्मेदार ठहराने का प्रावधान शामिल है। ऐसे हादसों के लिए संबंधित प्राधिकरण, ठेकेदार, डिजाइन बनाने वाली संस्था और कंसल्टेंट में जो भी जिम्मेदार होगा, उसे दोषी माना जाएगा। इन हादसों में मौत या दिव्यांग होने की स्थिति में जिम्मेदार संस्था, कंपनी या ठेकेदार पर एक लाख का जुर्माना लगेगा। हालांकि यह नियम अभी लागू नहीं हुआ है। अगले चरण में इसे लागू करने की उम्मीद है। यह सवाल है कि सड़कों पर कीचड़ होने से जो दुर्घटना होगी उसके लिए जिम्मेदार कौन? इन दिनों बारिश में टोल सड़कों पर भी गड्ढे हो जाते हैं। अन्य सड़कें भी उबड़-खाबड़ हो जाती है, ट्रॉफिक नियमों का पालन करने वाला भी दुर्घटना का शिकार हो जाता है, इसके लिए जिम्मेदार कौन? इन सवालों का उत्तर जब तक नहीं मिलता, तब तक केवल ट्रॉफिक नियमों का कड़ाई से पालन करने से दुर्घटनाओं में कुछ कमी हो सकती है।