निजाम को झुकना पड़ा
   Date07-Sep-2019

प्रेरणादीप
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए दान प्राप्त करने हेतु महामना मदन मोहन मालवीय हैदराबाद आए। उन्होंने हैदराबाद के नवाब से इस पुनीत काम के लिए दान देने का विनम्र अनुरोध किया। वह दान देने को किसी तरह राजी नहीं हुआ। उसने साफ शब्दों में दान देने से मना कर दिया। अब दो हठी आमने-सामने थे। एक का न देने का संकल्प, तो दूसरे का लेकर ही जाने का संकल्प था। उसी समय किसी हिन्दू सेठ की शवयात्रा मुख्य मार्ग से जा रही थी। उस पर फूलों के साथ हिन्दू रीति-रिवाज के अनुसार पैसे भी फेंके जा रहे थे। पैसों को बटोरने वाले तो बहुत थे, किन्तु उनमें से एक थे, महामना मदन मोहन मालवीयजी। उन्हें वहां पैसे बीनते देखकर सभी आश्चर्यचकित थे। किसी ने पूछा - भगवन्! आप ये क्या कर रहे हो? उन्होंने उसे सतर्क उत्तर देते हुए कहा - भाई! मुझे काशी में लौटकर यह तो बताना ही पड़ेगा कि क्या लेकर आए हो? यहां से खाली हाथ जाने की अपेक्षा कुछ साथ लेकर जाना ठीक रहेगा। नहीं तो लोग कहेंगे कि इतने बड़े नवाब के यहां से खाली हाथ आप कैसे आए? बात कहां छिपने वाली थी। किसी ने जैसी की तैसी नवाब से जाकर कह दी। निजाम को लज्जित हो विश्वविद्यालय के लिए रुपया देना पड़ा।