अपनी-अपनी भूल
   Date06-Sep-2019

प्रेरणादीप
ए क बार की बात है एक निषाद पत्नी गर्भवती थी। उसकी आम खाने की इच्छा हुई। वह ऋतु आमों की नहीं थी, पर निषाद ने सुन रखा था कि राजा के बाग में एक पेड़ बारहों महीने फलता है। सो वह रात्रि के समय उस बाग में गया और पेड़ पर चढ़ गया। आम ढूँढता रहा, पर मिले नहीं। इतने में सुबह हो गई। दिन में उतरकर जाने से पकड़े जाने का भय था, सो वह वहीं बैठा रहा और रात्रि आने पर लौटने का निश्चय किया। दिन में आम दिखाई पडऩे की आशा भी ज्यादा थी। दिन में वहाँ पर राजा और पुरोहित आए और पुरोहित राजा को एक गुप्त मंत्र सिखाने का उपक्रम चलाने लगा। उसी पेड़ के नीचे राजा ऊँचे पर बैठे थे और पुरोहित जमीन पर। उपक्रम चलने लगा तो निषाद से न रहा गया और वह पेड़ पर से नीचे उतर आया। दोनों स्तब्ध थे। उनकी स्तब्धता को तोड़ते हुए उनसे निषाद ने कहा- 'मैं भ्रष्ट हो गया। यह पुरोहित मर चुका और आप मूर्ख हैं। मंत्रानुष्ठान की बात निरर्थक है।Ó उनकी जिज्ञासा का समाधान करते हुए उसने कहा-'मैं पत्नी के हठ से प्रभावित होकर चोरी करने चला, सो मैं भ्रष्ट हुआ। पुरोहित नित्य मांसमिश्रित राज्याश्रय का कुधान्य खाते-खाते अपनी आध्यात्मिक क्षमता गँवा बैठा है, इसलिए यह मर गया और राजा मूर्ख है, जो मंत्र देने वाले का स्तर न देखकर उसके सहारे सिद्धियाँ प्राप्त करने की कामना करता है।Ó तीनों अपनी-अपनी भूलें समझते हुए उठकर अपने-अपने घर चले गए।