आत्महीनता की ग्रंथी से मुक्त क्यों नहीं नारी?
   Date06-Sep-2019

धर्मधारा
कि सी भी कार्य को टालने के बजाय उसे करने की आदत डालें, समय प्रबंधन का विशेष ध्यान रखें। किसी भी समस्या को समाधान तक पहुँचाए बिना उसे न छोड़ें। समस्या के समाधान के बहुत सारे तरीके हो सकते हैं, लेकिन जो सबसे श्रेष्ठ व हितकारी तरीका हो, उसे ही चुनें। आत्मविश्वास व अहंकार में फरक होता है, इसलिए आत्मविश्वासी तो बनें, लेकिन अहंकारी नहीं। अपने कार्यों के प्रति सजग रहें, प्राथमिकता के आधार पर अपने कार्य करें, लेकिन निर्धारित समय-सीमा में उन्हें पूरा करें, अन्यथा समय सीमा के बाहर किया जाने वाला अच्छे-से-अच्छा कार्य भी कभी-कभी निरर्थक हो जाता है। इसलिए समय सीमा में अपने कार्यों को पूरा करने की आदत डालनी चाहिए।
कोई भी कार्य तभी अच्छे से पूरा होता है, जब उसे एक योजना के तहत पूरा किया जाए। अगर कार्य करने की योजना नहीं है, तो कार्य भी आधा-अधूरा पूरा होता है और अपूर्ण रहता है, अत: महिलाएं अपने कार्यों को योजनाबद्ध ढंग से पूरा करें, भले ही उनके पास बहुत सारे कार्य हों, लेकिन अपनी समझदारी से उन्हें प्राथमिकता के आधार पर चुनें। समय-समय पर अपना आत्मविश्लेषण अवश्य करें। हमारे अंदर जो भी खामियाँ हैं, त्रुटियाँ हैं, आत्मविश्लेषण करने से वे हमारे समक्ष आ जाती हैं, जिन्हें स्वीकार कर हम उन्हें दूर कर सकते हैं और अपनी क्षमताओं में निखार लाकर, अपनी क्षमताएँ बढ़ाकर भी अपनी खामियों व कमियों को दूर कर सकते हैं।
यदि महिलाओं में आत्महीनता, आत्मग्लानि व असुरक्षा से संबंधित मनोग्रंथियाँ हैं, तो भी ऐसी महिलाएँ सहज रूप से आगे नहीं बढ़ पातीं, अत: श्रेष्ठ व आदर्श महिला बनने के लिए सबसे महत्वपूर्ण कदम यह है कि पहले स्वयं को ग्रंथिमुक्त करें और स्वयं के अंदर यह आत्मविश्वास पैदा करें कि हम सब कुछ कर सकते हैं। इसके उपरांत ही महिलाएं अपने उचित प्रयासों व लक्ष्यों में सफल हो सकती हैं।
हमारे समाज में अनेक ऐसी महिलाओं के उदाहरण हैं, जो स्वयं को सामान्य स्तर से शीर्ष स्तर तक ले गईं, उन्होंने अपने जीवन में अथक श्रम किया, कभी-भी हार नहीं मानी और अपने अटूट विश्वास के बल पर सफलता के शिखर पर पहुँची, ऐसी महिलाओं से मिलकर व उनके जीवन से प्रेरणा लेकर भी महिलाएँ श्रेष्ठ व्यक्तित्व की धनी बन सकती हैं।