सत्ता की बंदरबांट के लिए घमासान
   Date06-Sep-2019

इन दिनों मध्यप्रदेश कांग्रेस में आपसी गुत्थमगुत्था चल रही है। यहां कांग्रेस की कमलनाथ सरकार है, ज्योतिरादित्य, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, कमलनाथ के गुट के बीच न केवल खींचतान चल रही है, बल्कि एक दूसरे पर खुलेआम भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं। दिग्विजय पर वन मंत्री उमंग सिंघार ने रेत खनन में भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है। सहकारिता मंत्री डॉ. गोविन्द सिंह ने कहा कि रोज 200 ट्रक रेत का अवैध उत्खनन करवाते हैं। उनकी मदद दिग्विजय सिंह कर रहे हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि मैं घुट घुटकर नहीं जीना चाहता। जल्द इस्तीफा देकर भाजपा में चला जाऊंगा। मैंने कई कर्मचारियों के ट्रांसफर के लिए स्वास्थ्य मंत्री से निवेदन किया, लेकिन वे संबंधित को भोपाल-इन्दौर का चक्कर लगवाते हैं। मंत्री जी का बेटा हर काम के पैसे मांगता है। इसी तरह अंबाह के कांग्रेस विधायक कमलेश जाटव ने आरोप लगाया कि मैंने स्वास्थ्य मंत्री तुलसी सिलावट से आग्रह किया कि स्वास्थ्य कर्मचारी ब्रजेश उपाध्याय का ट्रांसफर का काम है, उपाध्याय को जब भोपाल भेजा तो उन्होंने (सिलावट) उसे इन्दौर भिजवा दिया। वहां उनके बेटे ने उपाध्याय से पैसे की मांग की और कहा कि विधायक से कहलवाने की जरूरत नहीं है। सीधे भी काम हो जाता। इन दोनों विधायक रणवीर जाटव और कमलेश जाटव ने स्वास्थ्य मंत्री सिलावट पर आरोप लगाया कि उनका बेटा बंकिम वर्षों से ट्रांसफर में पैसा ले रहा है। इसी घमासान के बीच कांग्रेस सरकार के परिवहन मंत्री गोविन्द सिंह राजपूत और श्रम मंत्री महेन्द्र सिंह सिसोदिया भी सामने आ गए। सिंधिया समर्थक दोनों मंत्रियों ने दिग्विजय सिंह पर सीधा आरोप लगाते हुए कहा कि चुनाव कमलनाथ और सिंधिया के नेतृत्व में लड़ा गया। अब किसी और को सरकार में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं। यह भी स्पष्ट कहा कि अगर किसी को हस्तक्षेप का अधिकार है तो वह सिंधिया को है। इस प्रकार उमंग सिंगार के आरोपों को आगे बढ़ा दिया। इसी बीच कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि सरकार अपने दम पर चलना चाहिए। किसी का भी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। आरोप गंभीर है, उमंग ने जो मुद्दे उठाए, उन्हें सुनना चाहिए। मुख्यमंत्री को दोनों से बात कर मसले को सुलझाना चाहिए। जयस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. हीरालाल अलावा ने कहा कि हमने अपनी बात मुख्यमंत्री के सामने रख दी है। यह हमारी सरकार को चेतावनी भी है। इधर मुख्यमंत्री कमलनाथ का कहना है कि दिग्विजयसिंह दस वर्ष तक मुख्यमंत्री रहे, उनके अनुभव का लाभ लेने के लिए समय-समय पर सलाह मशविरा लिया जाता है।
दृष्टिकोण
कांग्रेस पतन की ओर
मध्यप्रदेश-राजस्थान में विधानसभा चुनाव में चाहे मतों का प्रतिशत भाजपा को पक्ष में रहा हो, लेकिन सीटों के गणित में कांग्रेस कुछ आगे रही, इसलिए दोनों राज्यों में भाजपा की सरकार नहीं बन सकी। लोकसभा चुनाव में म.प्र. एवं राजस्थान की जनता ने कांग्रेस को बुरी तरह नकार दिया। हालत यह हुई कि राजस्थान की एक भी लोकसभा सीट पर कांग्रेस जीत दर्ज नहीं करा सकी और म.प्र. की 29 सीटों में कांग्रेस को केवल एक सीट मिली, वह भी मुख्यमंत्री कमलनाथ के लड़के की। इन दोनों राज्यों की कांग्रेस में भ्रष्टाचार की बंदरबांट और आपसी घमासान चल रहा है। राजस्थान में सचिन पायलट और मुख्यमंत्री गेहलोत के बीच खींचतान है और मध्यप्रदेश में कमलनाथ, सिंधिया और दिग्विजय के गुटों के बीच घमासान है, यह घमासान विद्रोह के रूप में सामने आ सकता है। कांग्रेस में अनुशासन की रेखा मिट चुकी है। न नीति है और न राजनीतिक दिशा है, कोई कुछ भी बोल रहा है, एक दूसरे पर खुलेआम आरोप लगा रहे हैं। हर कांग्रेसी बिना लगाम के घोड़े की तरह है। कांग्रेस के नेतृत्व को जनता के मूड को भी समझ नहीं पा रहा है। हाल ही में तीन तलाक पर कानून बनाने के विधेयक का कांग्रेस ने विरोध किया, जबकि न केवल मुस्लिम महिलाएं बल्कि पूरा देश तीन तलाक पर कानून बनाने के पक्ष में रहा। इसी तरह अनुच्छेद 370 एवं 35(ए) को हटाने के पक्ष में पूरा देश था, लेकिन कांग्रेस ने इसका विरोध किया। हालांकि सिंधिया, जनार्दन द्विवेदी आदि आधा दर्जन नेताओं ने 370 हटाने का समर्थन किया। संसद में भी गुलाम नबी आजाद और अधीररंजन चौधरी ने इस बारे में जो चर्चा की और राहुल गांधी ने कश्मीर की स्थिति को लेकर जो बयान दिए, उससे जनता का गुस्सा कांग्रेस के प्रति बढ़ा है। अब तो राजनीतिक पंडितों का मत है कि कांग्रेस किस तरह की राजनीति कर रही है, उससे वह अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मार रही है। राज्यों की कांग्रेस में भी घमासान चल रहा है। जहां सरकार है, वहां भ्रष्टाचार चरम पर है।