गुरुदेव की सीख
   Date12-Sep-2019

प्रेरणादीप
रा ष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन जोरों पर था। भारतमाता की जय बोलते हुए लोग कुरबानियों के लिए दौड़ पड़ते थे। उन्हीं दिनों वेदांतियों का एक मंडल विश्वकवि रवींद्रनाथजी से मिलने पहुंचा। एक सज्जन बोले - 'यह भारतमाता का हल्ला करके परेशानी मोल लेना संकीर्णताजनित है। भूमि जड़ है, यहां कौन अपना, कौन पराया? इसका मोह कैसा?Ó गुरुदेव कुछ गंभीर हुए, फिर बोले - 'आपकी माँ है?Ó उत्तर मिला - 'हाँ।Ó वे बोले - 'रात को माँ चीखे, तो आप दौड़ेंगे या सोएंगे?Ó उत्तर मिला - 'कौन हृदयहीन दौड़े बिना रहेगा?Ó गुरुदेव ने अगला प्रश्न किया- 'यदि कोई व्यक्ति माँ की आबरू उतारता दिखे या सिर काटता दिखे तो आप नश्वर शरीर रहने न रहने से क्या? ऐसा कहकर वापस आ जाएंगे?Ó इस प्रश्न पर वेदांती सज्जन क्रुद्ध हो पड़े व बोले - 'आपने हमें समझ क्या रखा है? उस दुष्ट को मार डालेंगे या मर जाएंगे।Ó गुरुदेव शांत स्वर में बोले - 'तो भाई! अब किसी से भारत माँ के नाम पर ऐसी छोटी बात मत कहना। जैसे आपको अपनी माँ दिखती है, उसके प्रति जो संवेदनाएं हैं, हम लोगों के वैसे ही भाव मातृभूमि के प्रति हैं। मैंने तो आपको शांति से समझाने का प्रयास ही किया है, पर कोई आप जैसा उत्तेजित होकर मरने-मारने पर तुल गया तो कठिनाई में पड़ जाएंगे। आस्थाहीन व्यक्ति दुष्टता पर अंकुश नहीं कर सकते, पर आस्थावान चुप नहीं रह सकते। रवींद्रनाथ टैगोर के इस तरह समझाने पर उन सज्जन को अपनी भूल का भान हुआ।Ó