भारतीय शिक्षा में सांस्कृतिक मूल्यों का समावेश जरूरी
   Date12-Sep-2019

डॉ. प्रसन्न दामोदर सप्रे
कि सी भी राष्ट्र को अपना भविष्य उज्जवल करना है तो शिक्षा, शिक्षा का उददेश्य, शिक्षा प्रदान करने की उत्तम व्यवस्था और शिक्षा देने वाले व्यक्ति का चयन ये अति महत्वपूर्ण घटक माने जाएंगे। दूसरी महत्वपूर्ण बात है उस राष्ट्र की बनावट। उदाहरणार्थ इंग्लैण्ड या फ्रांस या जापान या चीन की बनावट भारत से भिन्न है, यह आसानी से समझ में आने वाली बात है। राष्ट्र की बनावट का तात्पर्य वहां का भूगोल, वहां का समाज, वहां की संस्कृति तथा देश की आवश्यकताएं व इतिहास इसको ध्यान में रखकर ही वहां की शिक्षा नीति, उसका उद्देश्य और शिक्षा व्यवस्था आदि का निर्धारण करना आवश्यक रहेगा, तभी आदर्श और आशास्पद शिक्षा का स्वरूप उभरेगा। इसमें से एक भी घटक की ओर ध्यान नहीं दिया तो शिक्षा में त्रुटियां रह जाएंगी, परंतु इसका तात्पर्य ऐसा भी नहीं है कि अन्य राष्ट्रों की शिक्षा नीतियां और पद्धतियां जानना आवश्यक नहीं है। बेशक दूसरे राष्ट्रों की अच्छाइयों को अपने लिए अनुकूल करके ग्रहण भी करना अच्छा रहेगा।
शिक्षा का उद्देश्य संक्षेप में छात्रों का शारीरिक विकास और चारित्रिक, बौद्धिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास समुचित और संतुलित रूप से होना ही चाहिए। हमारे यहां आध्यात्मिक विकास मात्र संप्रदायों के आधार पर ही संभव है, ऐसी गलत धारणा विदेशियों के आक्रमण और उनके दीर्घ शासन होने के कारण, जो हजार-बारह सौ वर्षों तक बड़े भू-भाग पर रहा, बन गई है। वास्तव में उच्च चरित्र का गठन आत्यात्मिक मूल्यों के कारण, न कि मात्र संप्रदायों के कारण, संभव होता है इतना ही हम यहाँ पर कहना चाहेंगे। भारत के परिप्रेक्ष्य में ऊपर दिए हुए सर्वदेशीय और सर्वकालिक उद्देश्यों के साथ ही हमारी सहस्त्रों वर्षों से चली आई राष्ट्रीय पहचान को सृदृढ़ करते रहने की भी आवश्यकता है। हमारी राष्ट्रीय विशिष्ट पहचान (हृड्डह्लद्बशठ्ठड्डद्य ढ्ढस्रद्गठ्ठह्लद्बह्ल4) तो हमारी विशिष्ट संस्कृति के कारण है, इसको सभी जानते ही हैं। हमारी संस्कृति और सभ्यता की (ष्टद्ब1द्बद्यद्ब5ड्डह्लद्बशठ्ठ ड्डठ्ठस्र ष्टह्वद्यह्लह्वह्म्द्ग) विशेषता किसमें निहित है? क्या यह मात्र बाहरी रूप से ग्रहण करने वाले घटकों यथा भाषा-भूषा, स्थापत्य, खानपान, सार्वजनिक पर्व-त्योहार आदि तक ही सीमित है? सामान्य रूप से यह आवश्यक तो है, परंतु अनिवार्य नहीं है। हां भाषा, जिसमें विशिष्ट मूल्यों और विशिष्ट सामाजिक अनुभव और अभिव्यक्तियां संग्रहित हुई हैं, अवश्य ही अनिवार्य रूप से आवश्यक है ऐसा कहना पड़ेगा।
हम यह भी जानते हैं कि संस्कृत भाषा विशेष रूप से इसलिए आवश्यक है कि यह विश्व की सर्वाधिक पुरानी और जीवित भाषा है, जिसमें सांस्कृतिक मूल्यों, अत्यधिक पुरातन इतिहास, अमूल्य ज्ञान भंडार विद्यमान है ही, साथ में यह अत्यंत परिष्कृत, वैज्ञानिक और समृद्ध भी है।
विश्व में भी इसकी ऐसी मान्यता है यह भी हम न भूलें। अत: शिक्षा में इसका समावेश करना अनिवार्य रहेगा। माध्यमिक (6 वीं से 10 वीं) शिक्षा में इसका समावेश हो ऐसा लेखक का मत है। इसका विरोध करना याने हमारी राष्ट्रीय पहचान को कमजोर करना होगा, सबको मातृभाषा में शिक्षा देना श्रेष्ठ है ऐसा विश्व के सभी शिक्षाशास्त्रियों का मत है। इससे छात्रों को उत्तम रीति से शिक्षा ग्रहण करना आसान होगा, वह बोधगम्य होगी। यह देश का दुर्भाग्य ही है कि शिक्षा का प्रारंभ ही अंग्रेजी भाषा में बढ़ता हुआ दिख रहा है। जापान, चीन, फ्रांस, रूस, जर्मनी, आदि सभी राष्ट्रों में मातृभाषा में ही शिक्षा का प्रारंभ और अंत होता है। ये राष्ट्र विज्ञान, तकनीक, साहित्य और विविध कलाओं में पिछड़े हैं क्या?
इन सारे राष्ट्रों में बहुत ही थोड़ी सी संख्या में लोग अंग्रेजी का ज्ञान रखते हैं। यह भी जान लें कि इन देशों की उच्च शिक्षा और अनुसंधान संस्थानों में संस्कृत का गहन अध्ययन भी होता है। हमारे देश को नोबल या तत्सम पुरस्कार कितने लोगों को मिला है? विविध विषयों में गहन और मौलिक अनुसंधान में रत लोगों की संख्या भी कम क्यों है? शिक्षा का स्तर अंतर्राष्ट्रीय उन्नत राष्ट्रों के स्तर तक क्यों नहीं पहुंच रहा है? इन सबका एक प्रमुख कारण यह है कि हम अपनी भाषा में शिक्षा नहीं दे रहे हैं यह है। अपनी ही भाषा में संपूर्ण शिक्षा देने का हमारा आग्रह रहा तो वह सभी विषयों में शिक्षा देने के लायक उन्नत भी होती जाएगी ऐसा मुझे पूरा विश्वास है। हां, उच्च शिक्षा संस्थानों में तो विश्व की अधिकतम भाषाओं को पढ़ाने की व्यवस्था करनी चाहिए। शिक्षा में भाषा के संबंध में मूल रूप से इतना विचार करना पर्याप्त लगता है। संस्कृत के साथ हिन्दी भाषा का ज्ञान सभी माध्यमिक शालाओं में देने की व्यवस्था अवश्य ही रहे।
राष्ट्रीय पहचान के बाहरी स्वरूप के साथ ही जिसे हम आंतरिक स्वरूप या जीवनमूल्य कहेंगे वह भी अतीव आवश्यक है। यहां पर थोड़े से मूल्यों के संबंध में लिखा जाएगा। इसमें से एक अनूठा मूल्य है सभी संप्रदायों के प्रति भी आदर का भाव रखना, समादर का भाव होना। इसी के कारण भिन्न भिन्न संप्रदायों के अनुयायियों के प्रति भारतीयों के मन में अनुचित, विरोधी या प्रतिकूल भाव उत्पन्न नहीं होता। अत: अनेक प्रकार की अनेकता या विविधता के रहते हुए भी राष्ट्र में शांति है, सुरक्षा के भाव हैं और इसलिए देश छोड़कर कोई भागता भी नहीं है। ऐसी इच्छा भी नहीं होती है।
यहां की संस्कृति में रचा बसा आदमी किसी का पूजा-उपासना स्थल तोड़कर अपनी घृणा व्यक्त नहीं करता। दूसरा ऐसा ही महत्वपूर्ण गुण है सर्वव्यापी मातृभाव। संस्कृति का यह गुण भी कितना उदात्त और उच्च है! जड़-चेतन कोई भी वस्तु श्रेष्ठ है, संवर्धन, पालनपोषण करने वाली है उसको हम माता के रूप में देखते हैं। सभी उम्र की महिलाओं को ही माँ के रूप में देखते हैं, इतना ही नहीं, तो गाय को, जन्मभूमि को, गंगा को, गीता ग्रंथ को और पुरूषाकार भगवान को भी मां कहकर पुकारते हैं।
भारत की संस्कृति की इस अनूठी, उच्च धारा को महत्वहीन बनाने का कार्य दुर्भाग्य से हम मानों जोर-शोर से अनजाने में ही क्यों न हो, कर रहे हैं। परिणाम स्वरूप बलात्कार के अपराध का ग्राफ ऊपर जा रहा है। विश्व में भारत की प्रतिमा क्या रहेगी? तीसरा महत्वपूर्ण गुण है। हम पृथ्वी की सारी मानवजाति को ही अपने कुटुम्ब का सदस्य मानते हैं। 'वसुधैव कुटुंम्कमÓ यह वेदवचन प्रसिद्ध है। अत: विदेश के व्यक्ति यदि आश्रयार्थ आते हैं तो हम सहर्ष भारत में आश्रय देते हैं। हमारे देश में ईरान से जरथुष्ट्र के अनुयायी अपने पंथ-संस्कृति को बचाने के लिए भारत में आए। क्या भारतीयों ने उनका अपमान किया? उनके लिए हमने आवश्यक और उचित कार्य करने की छूट दे दी। इस अग्नि-उपासकों ने ईरान से जो पवित्र अग्नि लाकर भारत में स्थापित की थी, यह आज भी है! मराठी में कहते हैं-उनके केश को भी धक्का लगाया नहीं है। विस्थापित यहूदियों को हमने स्थान दिया, उनको इज्जत के साथ रखा, आज भी कुछ हैं।
यहूदियों को अपनी पुरातन भूमि जब फिर से दूसरे महायुद्ध के बाद राष्ट्र के रूप में प्राप्त हुई तो वहां के इतिहास में पढ़ाया जाता है कि विस्थापित यहूदियों को विश्व के सभी देशों मे द्वितीय श्रेणी के अपमानित नागरिकों के रूप में ही व्यवहार पाया जिसमें मात्र भारत ही अपवादस्वरूप रहा। अस्तु संक्षेप में ऐसे जो बाह्य और आंतरिक सांस्कृतिक मूल्य है, जिनका पोषण और संरक्षण का भाव छात्रों में जगाना अति आवश्यक है। अत: पाठ्यपुस्तकों में इन सांस्कृतिक मूल्यों का समावेश हो। अब और अधिक विस्तार न करते हुए अन्य पहलुओं पर विचार करना चाहिए।