चंद्रमा और भारत का चंद्रयान-2...
   Date10-Sep-2019

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र (इसरो) के कठोर परिश्रम का ही नतीजा है कि नासा को भी उसके प्रयासों की भूरि-भूरि प्रशंसा करना पड़ी है... क्योंकि जिस एकजुट प्रयास के साथ चंद्रयान को सफल किया गया है, वह अपने आप में एक मिसाल है... चंद्रमा अब बदल गया है... बेशक, कोई बदलाव चांद में नहीं हुआ, लेकिन चांद के बारे में हमारी सोच अब बदल गई है... हालांकि हमारी कुछ मान्यताएं कभी नहीं बदलतीं... जैसे जिन मान्यताओं में चांद एक देवता है, उनमें वह देवता ही रहेगा... या उन मान्यताओं में.., जहां चांद के दो टुकड़े कर दिए गए थे, वहां भी कुछ बदलाव नहीं होने वाला... फिलहाल हमारे लिए धारणाओं के वे बदलाव ही महत्वपूर्ण हैं, जो 20वीं सदी से तब सामने आने शुरू हुए, जब विज्ञान ने खूबसूरत चांद की पथरीली सतह को छूने की कोशिशें शुरू कीं... उस समय दुनिया में दो प्रतिद्वंद्वी महाशक्तियां थीं- अमेरिका और सोवियत संघ... दोनों में ही चांद तक पहुंचने के लिए अभियान-दर-अभियान होड़ लगी... तब चांद सिर्फ एक मंजिल था... ऐसी मंजिल, जिसे चंद दशक पहले तक लगभग असंभव माना जाता था... चांद तक पहुंचना, वहां यान को उतारना और उसकी सतह पर इंसान की चहलकदमी, ये कुछ ऐसे महाप्रयास थे, जिनके लिए विज्ञान की विभिन्न शाखाओं की लगभग दो पीढिय़ां खप गईं... जब इन सारी मंजिलों को नाप लिया गया, तो अचानक चांद को लेकर होने वाले शोध और अभियानों में एक ठहराव-सा आ गया... इस मंजिल से आगे की मंजिल क्या होगी, इस पर तब तक ज्यादा सोचा भी नहीं गया था... असंभव को प्राप्त करने के बाद आगे की संभावनाओं पर सोचना मुश्किल भी हो जाता है...
इस धरती और आकाश की कोई भी जगह, चाहे वह कितनी भी दूर और दुरूह क्यों न हो, खुद को इंसान के सपनों, उसके जोखिमभरे अभियानों और उसके लालच से भला कब तक बच सकती है..? 21वीं सदी होते-होते दुनिया ने चांद में नए सिरे से दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी... इसके बाद से ही हमारी सोच में चांद एक बार फिर बदलने लग गया... अब चांद को एक संसाधन के रूप में देखा जाने लग गया... चांद पर संभावित बहुमूल्य खनिजों का अध्ययन होने लग गया और वहां बस्तियां बसाने के सपने देखे जाने लगे... ऐसी कंपनियां बन गईं, जो अंतरिक्ष-पर्यटन की व्यवस्थाएं स्थापित करने में जुट गईं... यह भी कहा जाने लगा कि अगर हमें दुनिया के दूसरे ग्रहों तक पहुंचना है, तो चांद का इस्तेमाल आधार शिविर के रूप में हो सकता है... यानी आधी सदी पहले तक जो एक दुर्लभ सी मंजिल थी, उसे अब पड़ाव बनाने की तैयारियां शुरू हो गईं...
इस बीच शीत युद्ध खत्म हो चुका था और भारत समेत दुनिया के क्षितिज पर ऐसी कई ताकतें उभरने लगीं, जिन्होंने चांद तक पहुंचने की तकनीक में महारत हासिल कर ली थी... चंद्रयान-2 चांद पर शोध का भारत का दूसरा और उसकी सतह पर उतरने का पहला प्रयास है, जिसकी एक बड़ी खासियत यह है कि यह अभियान हमें दुनिया की सबसे बड़ी और विकसित महाशक्तियों के बराबर खड़ा कर रहा है... यह सच है कि एक संसाधन के रूप में और अंतरिक्ष-पड़ाव के रूप में या फिर पर्यटन स्थल के रूप में चांद की उपयोगिता अभी दूर की कौड़ी है... फिलहाल जो स्थिति है, उसमें चंद्रमा से खनिजों को लाना कठिन ही नहीं, बुरी तरह घाटे का सौदा भी है... अभी इसका महत्व सिर्फ इतना है कि यह बड़ी संभावनाओं का द्वार है... अभी चंद्रयान अभियान का अर्थ है दूर भविष्य की संभावनाओं में निवेश करना... अच्छी बात यह है कि भारत इसे सफलता के साथ कर रहा है... नई स्थिति में जिस तरह से इसरो ने अपनी साधना में संसाधन व साध्य की पवित्रता बनाए रखते हुए मिशन को पूर्ण करने में दिन-रात एक किया और करीब यह एक दशक से अधिक के कठोर परिश्रम का नतीजा है कि आज भारत चांद के उस ध्रुव पर उतरने में लगभग सफल हुआ है, जहां पर दुनिया का कोई देश ऐसा करने में सफल नहीं हुआ... यह उपलब्धि सिर्फ वैज्ञानिक खोज-तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि अब भारत के प्रत्येक क्षेत्र में बढ़ती उस प्रमाणिक कार्यशैली का भी प्रमाण है, जो उसे लंबे समय तक पूर्व में भी 'विश्व गुरुÓ के रूप में विश्व का नेतृत्वकर्ता रहा है... भले ही यह सबकुछ स्वीकार करने में विश्व के देशों का संकोच हो, लेकिन आज वैज्ञानिक शोध क्षेत्र में, तकनीक के क्षेत्र में और उन तमाम तरह के नए अविष्कारों के परिप्रेक्ष्य में भारत के प्राचीन धर्मग्रंथों, शाों एवं देववाणी को ही पुन: अपने-अपने तरीके से परिभाषित करने का प्रयास किया जा रहा है... इसलिए चांद के संदर्भ में भारत की नई भूमिका विश्व के लिए नई राह खोलेगी...