सत्कर्म का अवसर
   Date10-Sep-2019

प्रेरणादीप
ए क बार पांच असमर्थ और अपंग लोग एक स्थान पर इकट्ठे हुए और कहने लगे- 'यदि भगवान ने हमें समर्थ बनाया होता तो हम लोगों का बड़ा परमार्थ करते।Ó अंधे ने कहा-'यदि मेरी आंखें होतीं तो जहां कहीं गलत देखता तो उसे सुधारने में लग जाता।Ó कुछ ऐसी ही बातें लंगड़े ने भी कहीं। लंगड़े ने कहा-'यदि मेरे पैर होते तो दौड़-दौड़कर लोगों की भलाई करता।Ó निर्बल व्यक्ति बोला-'यदि मुझमें बल होता तो मैं अत्याचारियों को मार-मारकर ठीक कर देता।Ó निर्धन ने कहा-'यदि मैं धनी होता तो दीन-दु:खियों के लिए अपना सब कुछ लुटा देता।Ó वरुण देव उन सबकी बातें सुन रहे थे। उनकी सेवा-भावनाओं को परखने के लिए उन्होंने अपना आशीर्वाद उनको देकर सबकी इच्छाएं पूर्ण कर दीं, परंतु परिस्थिति के बदलते ही उन सबके विचार भी बदल गए। अंधे को आंखें मिलते ही वह सुंदर वस्तुएं देखने में लग गया एवं लोक-सुधार की बात को भूल गया। लंगड़ा भी लोगों की भलाई करने की बात को भूलकर सैर-सपाटे के लिए निकल पड़ा। निर्धन धनी बनते ही भौतिक सुविधा-साधन जुटाने में लग गया और दान इत्यादि की बात को भुला बैठा। निर्बल ने बलवान होने के बाद दूसरों को आतंकित करना प्रारंभ कर दिया। मूर्ख ने विद्वान बनकर दूसरों को मूर्ख बनाना प्रारंभ कर दिया। वरुण देव ने खिन्न होकर अपने वरदान वापस ले लिए। अब वे पछताने लगे। हमें भी विचार करना चाहिए, हम भगवान की दी हुई सिद्धियों का सदुपयोग करें।