आध्यात्म का पथ ही मानव जीवन का संबल
   Date09-Aug-2019

धर्मधारा
आ ध्यात्मिक साधना इस जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ है, जिसके आधार पर मानव जीवन की गरिमा का बोध होता है। इसका अपना विज्ञान है और अपना विधान भी। यह निश्चित रूप से समयसाध्य एवं कष्टसाध्य है, लेकिन इसकी फलश्रुतियां स्वयं में अनुपम एवं अद्वितीय हैं। प्रस्तुत हैं कुछ ऐसे सोपान, जिनका अवलंबन आध्यात्मिक पथ पर बढ़ रहे साधक के लिए पाथेय का काम करता है।
गुरु ईश्वर का प्रतिनिधि होता है, जो शिष्य के कल्याण के लिए धरती पर अवतरित होता है। सौभाग्यशाली हैं वे, जिन्हें कोई सद्गुरु मिला। दीक्षा के समय गुरु के बताए मार्ग एवं व्रत बंधनों का अनुपालन आध्यात्मिक विकास का आधार है। नित्य उपासना के क्षणों में यह संबंध और प्रगाढ़ होता है। साथ ही नित्य उसके रचित आध्यात्मिक ग्रंथों का पारायण सीधे उसकी आत्मचेतना से जोड़ता है। दिनभर साधना समर के विशिष्ट पलों में इन विचारों की सेना ही साधक का संबल बनती है और समाधानपरक आध्यात्मिक प्रकाश देती है। दिनभर जितना अधिक हम गुरु की दिव्य चेतना के साथ रहेंगे, उतना ही यह हमारे लिए हितकारी होगा।
गुरु ही हमें ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग दिखाते हैं। ईश्वर को जानने व पाने की हमारी अभीप्सा अपनी होनी चाहिए। अपनी श्रद्धा एवं भक्ति के आधार पर हम उनसे प्रगाढ़ संबंध बनाते हैं। संसारी रिश्ते कितने भी प्रिय व सच्चे क्यों न हों, उनकी अपनी एक सीमा होती है। वे नश्वर हैं व काल के साथ परिवर्तनशील भी। मात्र ईश्वर ही शाश्वत, नित्य एवं सतत सत्य हैं, जिनसे हमारी आत्मा का अनंत जन्मों से नाता है। तात्विक रूप में हम स्वयं वही है।
हमारी आस्था का आधार पर शाश्वत तत्व होना चाहिए, जिससे हम जीवन के वियोग-विछोह एवं दु:ख के बावजूद विचलित नहीं होंगे।