पानी को हथियार के रूप में प्रयोग करने की साजिश
   Date08-Aug-2019

वजय कपूर
खू न इस दौरे-गरानी में बहुत सस्ता है/रात फिर गांव में इक कत्ल हुआ पानी पर। हफीज मेरठी ने एकदम सही कहा हैकि इस दौर-गरानी (महंगाई के दौर) में खून पानी से भी सस्ता हो गया है। मसलन बीती 6 जून को प्यासी रांची (झारखंड) में नगर निगम के वाटर टैंक से पानी लेने के लिए झगड़ा इतना बढ़ा कि चार व्यक्तियों के चाकू घोंप दिए गए। रांची में जल संकट दो हिस्सों में विभाजित है- ग्राउंड वाटर में निरंतर आ रही कमी और सतह के जल भंडारों से सप्लाई का अभाव। फिर बारिश का कोई भरोसा नहीं है। नतीजा यह हो गया है कि पांच दशक पहले रांची में 100 से अधिक तालाब थे, जो इस समय 40 से भी कम रह गए हैं। यह स्थिति राज्य की राजधानी की है, बाकी जगह का अंदाजा स्वत: ही लगाया जा सकता है। यह हाल सिर्फ झारखंड भर का नहीं है, बल्कि देश के अनेक राज्यों का है। जहां से लगातार पानी की किल्लत की खबरें आती रहती है, इस हद तक कि महिलाओं व बच्चों का अधिकतर समय कई-कई किलोमीटर दूर से पीने का पानी लाने में ही गुजरता है। पूरे देश को पाइप के जरिए पानी पहुंचाने का इरादा केन्द्र सरकार ने अवश्य घोषित किया है, लेकिन यह कठिन कार्य कब आरंभ व पूर्ण होगा, फिलहाल कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन इतना ही महत्वपूर्ण यह है कि नई दिल्ली दक्षिण एशिया में अपने पड़ोसी देशों के साथ जल मुद्दे पर सक्रिय डिप्लोमेसी में पहल करें, क्योंकि इस क्षेत्र में पानी नया तेल बनता जा रहा है।
ध्यान रहे कि तेल का तो विकल्प है कि ऊर्जा के अन्य ोतों को टैप करके उस पर निर्भरता को कम किया जा सकता है। लेकिन पानी का कोई विकल्प नहीं है। इसलिए आवश्यक है कि भारत वाटर डिप्लोमेसी को अपनी क्षेत्रीय विदेश नीति का अटूट हिस्सा बनाए ताकि नियम-आधारित सहयोग के लिए मार्ग प्रशस्त हो और टकराव से बचा जा सके। यह सब कई कारणों से जरूरी हो गया है। नेपाल चीन की ओर झुक गया है, जो न सिर्फ इस बात से स्पष्ट है कि उसके स्कूलों में मंडारिन भाषा की शिक्षा लाजमी कर दी गई है, बल्कि यह भी कि उसने चीन से बुधी-गंडकी बांध बनाने की जिस डील को रद्द कर दिया था, उसे फिर से बहाल कर दिया है। 1200 मेगावाट का यह बांध 2.5 बिलियन डालर में बनेगा। गौरतलब है कि इस समय चीन भारतीय सीमा के पास म्यांमार व तिब्बत से लेकर पाक-अधिकृत कश्मीर तक बांध बनाने के काम में लगा हुआ है। पाक अधिकृत कश्मीर में वह 720 मेगावाट करोट व 1124 मेगावाट कोहाला बांध बना रहा है, यह तथाकथित चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे में चीन का सबसे बड़ा निवेश है। भारत की विशेष रिपरियन (नदी तटीय) स्थिति है। यह इस क्षेत्र का एकमात्र देश है, जिसमें रिपरियन की तीनों श्रेणियां- अपर, मिडिल व लोअर-मौजूद हैं। दूसरे शब्दों में भारत की जो भौगोलिक स्थिति है, उसके कारण क्षेत्र की सभी महत्वपूर्ण नदियों में उसकी दावेदारी है। अब अपस्ट्रीम देशों जैसे चीन व नेपाल में जो भी जल संबंधी गतिविधियां होंगी वह भारत को प्रभावित करेगी, जबकि जो डाउन-स्ट्रीम देश हैं, जैसे पाकिस्तान (सिंध) व बांग्लादेश (गंगा) उनसे वह अपने जल समझौतों के कारण बंधा हुआ है। एशिया में भारत एकमात्र देश है जो चीन की जल री इंजीनियरिंग से सबसे ज्यादा प्रभावित होता है, क्योंकि चीन नियंत्रित क्षेत्रों से जो पानी सीधे या नेपाल से होती हुई नदियों से निकलता है, उसका लगभग आधा भारत को मिलता है। लेकिन इसके बावजूद वाटर डिप्लोमेसी भारत की विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं रही है। इंडस वाटर्स ट्रीटी एकतरफा है और पानी बंटवारे के संदर्भ में विश्व की सबसे उदार ट्रीटी है।
इस ट्रीटी को करते समय यह अध्ययन नहीं किया गया कि इसका दीर्घकाल में भारत की पानी स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ेगा? जैसा कि भारत की ओर से ट्रीटी तय करने वाली टीम के प्रमुख निरंजन गुलाटी ने बाद में अपनी पुस्तक में स्वीकार किया। नतीजतन आज विश्व में अरब प्रायद्वीप के बाद भारत के लोअर इंडस बेसिन (पंजाब-हरियाणा-राजस्थान पट्टी) में सबसे तेजी से ग्राउंड वाटर कम हो रहा है।
दूसरी ओर चीन व पाकिस्तान भारत के विरुद्ध पानी को हथियार के रूप में प्रयोग कर रहे हैं। पाकिस्तान की जल युद्ध योजना इंडस वाटर्स ट्रीटी के इर्द-गिर्द गूमती है, भारत से किसी भी मतभेद को अन्तर्राष्ट्रीय विवाद बनाने के लिए वह इस ट्रीटी के प्रावधानों का सहारा लेता है। चीन 2017 से भारत को जल डाटा नहीं दे रहा है, जो न केवल द्विपक्षीय समझौते का उल्लंघन है, बल्कि इसके कारण असम में बाढ़ से ऐसी मौते हुई है, जिन्हें बचाया जा सकता था। भारत के भीतर पहले से ही जल संकट है, जो भारतीय सीमा पर चीन की जल गतिविधियों से और गहरा हो सकता है।
इसलिए जहां भीतरी जल समस्या समाधान की आवश्यकता है, वहीं यह भी जरूरी है कि क्षेत्रीय विदेश नीति में वाटर डिप्लोमेसी को भी प्रभावी रूप से शामिल किया जाए। इस सिलसिले में भारत को संस्थागत, इंटीग्रेटेड नीति की जरूरत है जो उसके दीर्घकालीन जल हितों को आगे बढ़ा सके व उन्हें सुरक्षित रख सके। इस नीति का फोकस बांग्लादेश-भूटान-भारत-म्यांमार-नेपाल विकास गलियारे में बहुआयामी जल सहयोग पर होना चाहिए। यह सही है कि फिलहाल नेपाल का झुकाव चीन की ओर है, लेकिन भारत बांग्लादेश व म्यांमार पर भूटान की तरह ध्यान केन्द्रित कर सकता है, जहां वह संकोश नदी पर 2585 मेगावाट का बांध बना रहा है, जो कि भारत में किसी भी बांध से सबसे बड़ा है। भूटान, म्यांमार व नेपाल में अब भी विशाल हाइड्रोपॉवर रिजर्व हैं, जिनका प्रयोग शेष है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि क्षेत्रीय विकास में पानी का महत्व निरंतर बढ़ता जाएगा, इसलिए नई दिल्ली पानी पर ठोस डिप्लोमेसी योजना तैयार करे और सीमा जल मुद्दों पर प्रभावी नेतृत्व प्रदर्शित करे। लेकिन इसी के साथ यह भी जरूरी है कि देश के भीतर जो जगह-जगह जल संकट हैं, उनका त्वरित समाधान किया जाए, ताकि रांची जैसी दुखद व चिंताजनक स्थितियों से बचा जा सके।