मनुष्य के पुण्य कर्म ही ईश्वर का अर्चन
   Date08-Aug-2019

धर्मधारा
भ गवान कृष्ण ने बाललीला करते हुए अपनी माँ यशोदा को अपने मुख में ही सारी सृष्टि व ब्रह्मांड का दिग्दर्शन करा दिया था। भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को अपने विराट स्वरूप का दर्शन कराया था। भगवान राम ने भी अपने बाल रूप में अपनी माँ कौशल्या को अपने वास्तविक स्वरूप का दिग्दर्शन कराया था। इसके माध्यम से भगवान ने हमें यही संदेश दिया है कि यह सारा जगत ही उनका स्वरूप है। यह सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्मांड उनकी ही अभिव्यक्ति है। ईश्वर के प्रति हमें अपनी धारणा-अवधारणा बदलनी ही होगी और यदि हम सचमुच ऐसा करेंगे तो हम निश्चित ही निहाल होकर रहेंगे।
देवालयों में, शिवालयों में, गिरजाघरों और मस्जिदों में जाकर जैसे हम स्वयं को ईश्वर के समीप होने में, उन तक अपनी पुकार पहुंचाने में, उन्हें अपने मन की सुनाने में गहरी आस्था व भक्ति रखते हैं, वैसी ही आस्था, वैसा ही ईश्वरविश्वास-ईश्वर के इस ब्रह्मांडव्यापी स्वरूप में होना चाहिए। सृष्टि के कण-कण में ईश्वर की उपस्थिति है, वे सर्वव्यापी हैं, वे सर्वत्र है। हमारे शुभ-अशुभ, पाप-पुण्य भले-बुरे हर कर्म पर उनकी नजर है। हमारे द्वारा किए गए शुभ कर्म, पुण्य कर्म ही प्रभु की कृपा पाने के आधार हैं। स्वामी विवेकानंद ने ठीक ही कहा है कि हम भगवान को पत्थरों में देखें, पर उन्हें पत्थर न समझें। प्रभु को हम मूर्तियों में देखें, पर उन्हें मूर्तियों तक, देवालयों तक सीमित न समझें, क्योंकि वे तो असीम हैं। वे देवालयों में बंधे नहीं है, जैसा कि परमपूज्य गुरुदेव ने कहा है कि ईश्वर बंद नहीं है मठ में, वह तो व्याप रहा घर-घर में। यह पूरा विश्व ब्रह्मांड ही ईश्वर का रूप है। ईश्वर ने स्वयं को इस सृष्टि, इस जगत के रूप में ही प्रकट कर दिया है। यह जगत ही ईश्वर का जीवंत देवालय है, शिवालय है।
देवालयों, शिवालयों में तो हमारी उपस्थिति कभी-कभी ही हो सकती है, पर प्रभु के इस जगतमय देवालय में तो हर पल हम ही उपस्थित हैं। अपने पुण्य कर्मों से, शुभकर्मों से - हर पल हम उन्हीं का अभिषेक करते रहें, अर्चन करते रहें, वंदन और अभिनंदन करते रहें। फिर इस जगत में आपके द्वारा किसी असहाय के पोंछे गए आंसुओं से ही इस जगतमय शिव का अभिषेक होने लगता है। किसी की करुण पुकार पर उसकी सहायता, सेवा-सुश्रूषा हेतु हमारे दौड़ पड़ते ही सर्वव्यापी ब्रह्म का वंदन होने लगता है।