हृदय परिवर्तन
   Date06-Aug-2019

प्रेरणादीप
स न् 1963 की बात है, स्वामीजी सत्यमित्रानंगजी मुरैना से श्योपुर कलां जा रहे थे। गौरक्षा के लिए उनका देश का भ्रमण चल रहा था। अनेक स्थानों पर लोगों ने गौमाता की रक्षा के लिए पैसे इक_े कर स्वामीजी को भेंट किए थे। इसी उद्देश्य से उनकी मध्यप्रदेश की यात्रा चल रही थी। आज से पचपन साल पहले तो बागियों (डाकुओं) के कई गिरोह क्षेत्र में सक्रिय थे।
पूज्य स्वामीजी कार से यात्रा कर रहे थे। अकस्मात् एक गिरोह ने कार रोक ली। हाथ में राइफल लिए सरदार सामने आया और बोला- 'बाबा कार में बैठे हो, कुछ माल जरूर होगा। जो भी माल है उसे देकर चलते बनो।Ó स्वामीजी ने उत्तर दिया-'स्थान-स्थान पर गौरक्षा के लिए लोगों ने पैसे भेंट किए हैं। पचास हजार के लगभग होंगे। आप चाहें तो ले लें, पर लोग संदेह करेंगे। कहेंगे कि शंकराचार्य गौरक्षा के पैसे खा गया। फिर धर्म की रक्षा कैसे होगी?Ó यह सुन कर दस्यु सरदार ने स्वामीजी को प्रणाम किया, अपनी ओर से 101 रु. भेंट भी किए और रास्ता छोड़ दिया। स्वामीजी की कार आगे बढ़ गई।