मंदिर निर्माण का संकल्प अब होगा पूरा?
   Date06-Aug-2019

जयकृष्ण गौड़
जि स तरह कश्मीर भारत का अभिन्न अंग होने से विवाद का विषय नहीं था, लेकिन आजादी के बाद पं. नेहरू की गलत नीतियों के कारण इसे विवाद का विषय बना दिया। इसी तरह राम जन्मभूमि पर बने राम मंदिर को 1528 में हमलावर बाबर के आदेश से सेनापति मीर बांकी ने ध्वस्त कर वहां बाबरी ढांचा बना दिया। गुलामी के प्रतीक इस ढांचे को आजादी के बाद ही ध्वस्त कर वहां भव्य मंदिर का निर्माण उसी तरह किया जाना था, जिस तरह सरदार पटेल, के.एस. मुंशी ने सोमनाथ मंदिर का पुनरुद्धार किया था। यह विवाद का विषय नहीं था कि श्रीराम अयोध्या में जन्में थे और राम जन्मभूमि हिन्दुओं की अटूट श्रद्धा का स्थान सदियों से रहा है। महान ऋषि-मुनि-संतों ने रामायण और अन्य ग्रंथों से श्रीराम की कथा का वर्णन है। श्रीराम अयोध्या में जन्मे थे, इस बार में विवाद कभी नहीं हुआ। सवाल और संघर्ष इस बात का रहा कि विदेशी बर्बर हमलावर बाबर ने जन्म स्थान पर बने मंदिर को ध्वस्त कर जो बाबरी ढांचा खड़ा किया था, उस स्थान पर श्रीराम मंदिर का निर्माण कैसे किया जाए। इस बारे में भी बहस को कोई स्थान नहीं है कि श्रीराम भारत की अस्मिता और संस्कृति के प्रतीक है। उनके जन्म स्थान का पुनरुद्धार करना सरकार और जनता का दायित्व है।
विडंबना यह रही कि जो ढांचा 1936 से 1949 तक श्रीराम मंदिर ही था, वहां नित्य पूजा होती थी। ऐतिहासिक प्रमाणों से पता चलता है कि इस पवित्र स्थान के लिए हिन्दू चार सौ वर्षों तक संघर्ष करते रहे। कई बलिदान हुए। जहां तक मुसलमानों का सवाल है उनके लिए बाबरी ढांचे का न कोई धार्मिक महत्व है और न सांस्कृतिक का। भारत भूमि से इस ढांचे को कारसेवकों के एक समूह ने 6 दिसंबर 1992 को धराशायी कर दिया। यह सांस्कृतिक गुलामी से मुक्त कराने का संघर्ष था। 1947 में हमें राजनीतिक आजादी मिली, लेकिन सांस्कृतिक आजादी का संघर्ष अभी पूरा नहीं हुआ है। ध्वस्त किए गए मंदिर के प्रमाण मंदिर के तल की खुदाई से मिले है। इस ढांचे के ढहने के बाद इस स्थल पर हिन्दू मंदिर होने के पुरातात्विक, मूर्तिकला तथा शिलालेख संबंधी प्रमाण मिले है। 6 दिसंबर 1992 में जब बाबरी ढांचा गिरा तो इसमें करीब पचास कारसेवकों का बलिदान हुआ। सांस्कृतिक चेतना जाग्रत करने में भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा का भी प्रमुख योगदान रहा। 6 दिसंबर की घटना के बारे में वी.एस. नायपाल, भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक, जिन्हें 2001 में साहित्य का नोबल पुरस्कार मिला, उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया के तत्कालीन संपादक दिलीप पाडगांवकर को दिए अपने साक्षात्कार में पूछे गए सवाल के उत्तर में कहा था कि मेरी प्रतिक्रिया उतनी खराब नहीं थी, जितनी दूसरों की रही थी। जो लोग कहते हैं कि वहां मंदिर नहीं था, वे एक बात भूल रहे हैं। आपको यह समझना चाहिए कि बाबर उस देश से घृणा करता था, जिसे उसने जीत लिया था। उसने जो मस्जिद बनवाई थी, वह उस देश के प्रति नफरत के कारण ही बनवाई थी। तुर्की के सांता सदेफिया चर्च को मस्जिद में बदल दिया गया। निकोसिया में भी चर्चों को मस्जिद में बदल दिया गया। मुस्लिम हमलावरों से अपनी जमीन वापस लेने के लिए स्पेनवासियों को शताब्दियों का समय लग गया। ऐसी बातें पहले भी अन्य स्थानों पर हुई है। अयोध्या में पराभूत लोगों द्वारा पवित्र माने जाने वाले स्थान पर मस्जिद बनवाने का उद्देश्य उनका अपमान करना ही रहा था। यह एक प्राचीन धारणा याने राम से जुड़ी धारणा का अपमान था, जो दो या तीन हजार पुरानी थी। 1992 का वर्ष अयोध्या वर्ष रहा। टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादक रहे गिरीलाल जैन ने अयोध्या मामले और 6 दिसंबर की घटना के बारे में जो लिखा, उसका अंश इस प्रकार है- इतिहासकार भले ही तर्क वितर्क करते रहे कि अयोध्या में बाबरी ढांचे के स्थान पर मंदिर था या नहीं, यदि था तो वह राम मंदिर ही था या कुछ और... लेकिन इतिहास इस तरह नहीं चलता, न ही सभ्यागत मामले इस तरह सुलझाए जाते हैं। यह एक दृढ़ सत्य है कि अयोध्या में राम जन्मभूमि के लिए हिन्दुओं ने जितना कड़ा संघर्ष किया, उतना अन्य स्थान के लिए कभी नहीं किया। राम जन्मभूमि के प्रखर आंदोलन और बाबरी ढांचे को ध्वस्त करने की घटना को 27 वर्ष हो गए हैं।
जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का मामला न्यायालय की फाइलों में लटकाया, भटकाया गया। इलाहबाद न्यायालय की तीन जजों की बेंच ने बहुमत से निर्णय दिया कि अयोध्या में राम जन्मभूमि है, जिसे सदियों से राम जन्मभूमि माना गया। इस पावन भूमि के विवाद का मामला सर्वोच्च न्यायालय में चल रहा है। जो श्रीराम जन्मभूमि का राजनीतिक दृष्टि से आंकलन करते हैं, वे यह मानते हैं कि यदि इस मामले का निपटारा हो गया तो मुस्लिम नाराज हो जाएंगे। यह नाराजी हमारे वोट बैंक के घाटे का सवाल होगा। इस मामले के निराकरण में उलझन पैदा करने वाले है, मुस्लिम कट्टरपंथी जिनके लिए हमलावर बाबर आदर्श है, जो भारत की संस्कृति को अपनी संस्कृति नहीं मानते। जो इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करते कि भारत में बसे मुस्लिम की संस्कृति भी राम-कृष्ण की संस्कृति है, श्रीराम उनके भी महान पूर्वज है। दूसरे है कथित सेकूलर गिरोह जो श्रीराम के अस्तित्व को ही स्वीकार नहीं करते। जिनके लिए जन्मभूमि और रामकथा, काल्पनिक है। यह आज का टुकड़े-टुकड़े गैंग है। कांग्रेस के वकील कपिल सिब्बल और आर.के. धवन जो बाबरी कमेटी की ओर से पैरवी कर इस मामले को निर्णय तक पहुंचने में बाधा डालते रहे। 2014 में जब नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र में मोदी सरकार बनी तो हिन्दुओं को यह भरोसा रहा कि भाजपा के एजेंडे में राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण का संकल्प है, जो पूरा होगा। जब इस मामले को साजिश के तहत भटकाने का प्रयास हुआ तो विश्व हिन्दू परिषद् और साधु-संतों ने राम मंदिर निर्माण के लिए आंदोलन की चेतावनी दी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहनजी भागवत ने कहा कि यह सरकार का काम है कि मंदिर निर्माण का रास्ता क्या हो, मंदिर निर्माण शीघ्र होना चाहिए। 2019 के चुनाव में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला। अब हिन्दुओं को भरोसा है कि मोदी सरकार राम मंदिर के मामले के निराकरण में महत्व की भूमिका निभाएगी। भाजपा के संकल्प पत्र में भी राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का संकल्प है। इस मामले को आपसी सहमति से सुलझाने के लिए 1990 में विहिप और मुस्लिम पक्षकारों के बीच चर्चा हुई, लेकिन परिणाम नहीं निकला।
2003 में कांचीपुरम शंकराचार्य की पहल भी असफल रही। 2017 ने चीफ जस्टिस जे.एस. खेहर ने मध्यस्थता की इच्छा जताई। लेकिन बात नहीं बनी। अब 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने तीन मध्यस्थ नियुक्त किए थे। इनमें श्री श्री रविशंकर भी थे, इन्होंने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी। रिपोर्ट के अनुसार सहमति नहीं बन सकी। चार माह तक चर्चा चली, लेकिन बाबरी पक्ष के अडिय़ल रवैये से कोई बात नहीं बनी। अब चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता की पांच जजों की पीठ, जिसमें गोगोई के अलावा जस्टिल एस.एस. बोबड़े, डी.वाई. चंद्रचूड, अशोक भूषण और एस. अब्दुल नजीर है। मध्यस्थता की रिपोर्ट देखने के बाद फैसला किया कि अब 6 अगस्त से फैसला होने तक सुप्रीम कोर्ट नियमित सुनवाई करेगी। चीफ जस्टिस गोगोई 17 नवंबर को सेवानिवृत होंगे। सुनवाई के लिए इनके पास 35 दिन बचेंगे। उनके रहते फैसला नहीं हुआ तो संविधान पीठ पुन: गठित होगी। रोजाना सुनवाई से हिन्दू समाज को संतोष है, उम्मीद है कि 35 दिन में राम जन्मभूमि विवाद को न्याय मिलेगा। इस बार भी सेकूलर गैंग ने बाधा डालने की कोशिश की तो इसे हिन्दू बर्दाश्त नहीं करेगा। गत 70 वर्षों से हिन्दू ने धैर्य रखा है। हिन्दू की सहिष्णुता के पीछे आक्रोश को समझकर सुप्रीम कोर्ट को 35 दिन में निर्णय लेना होगा। जो मोदी सरकार तीन तलाक का कानून बनाकर मुस्लिम महिलाओं को आजादी दिला सकती है, उस सरकार पर भरोसा है कि सांस्कृतिक आजादी के लिए भी दृढ़ इच्छा का परिचय देगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं)