बचत का सूत्र
   Date05-Aug-2019

प्रेरणादीप
ह जरत अबूबकर का विश्वास था कि निर्धन से निर्धन नागरिक को जीवनयापन के लिए जितनी सुविधाएँ उपलब्ध हैं, उससे अधिक सुविधाएँ लेने का अधिकार राज्य के किसी कर्मचारी को नहीं होना चाहिए। इसलिए राज्य के कोषालय से अपने खर्च के लिए वे केवल दो दिरहम लेते थे।
हजरत की इस जान-बूझकर ओढ़ी गई निर्धनता से उनकी पत्नी तंग आ गई थी। उसे बिलकुल पसंद न था कि जिस व्यक्ति का पूरे राज्य में सम्मान हो, उसकी पत्नी गरीबी और परेशानी में जीवन यापन करे। एक दिन परेशान होकर उसने हजरत अबूबकर से कहा - 'यह भी कोई व्यवस्था है कि जब देखो तब सूखी रोटियाँ। ऐसा प्रयत्न कीजिए कि किसी दिन कुछ मिठाइयों की भी व्यवस्था हो सके, ताकि भोजन कुछ तो अच्छा लगे।Ó
हजरत अबूबकर ने उत्तर दिया-'खाना बनाने का काम तुम्हारे जिम्मे है। रोज-रोज थोड़ा बचाकर मिठाई की व्यवस्था की जा सकती है।Ó उनकी पत्नी ने सुझाव पर विचार किया और अपने दैनिक भोजन में से कुछ बचत आरंभ कर दी। इतनी बचत हो जाने पर उसने एक दिन उत्साह से पति को भोजन के साथ मिठाई भी दे दी। अबूबकर ने मिठाई के विषय में पूछा तो पत्नी ने गर्वपूर्वक बचत की बात बताई। यह सुनकर अबूबकर प्रसन्न हुए।
हमें दो दिरहम की जगह डेढ़ दिरहम में ही काम चला लेना चाहिए।Ó ऐसा कहकर उन्होंने गुजारे के लिए डेढ़ दिरहम लेने शुरू कर दिए। उनके इस व्यवहार ने पत्नी को भी नतमस्तक कर दिया।