आंकड़ों की सुरक्षा और स्थानीकरण पर कानून जरूरी
   Date14-Aug-2019

जयंतीलाल भंडारी
कि सी भी देश के लिए उसके उपभोक्ताओं से संबंधित आंकड़ों (कंज्यूमर डेटा) का महत्व भी लगातार बढ़ता जा रहा है। ऐसे में कोई एक सौ सैंतीस करोड़ आबादी वाला भारत तेजी से बढ़ती आर्थिक अहमियत के कारण आंकड़ों की नई दुनिया में लाभप्रद स्थिति में है। इसलिए यह जरूरी है कि भारत में काम करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जरूरी आंकड़े और भारतीय उपभोक्ताओं से संबंधित संवेदनशील जानकारियां भारत में ही स्टोर की जाएं। हाल में तकनीकी क्षेत्र की एक प्रमुख कंपनी की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि जुलाई 2018 से अप्रैल 2019 के बीच भारतीय कंपनियों के डेटा चोरी होने से इन कंपनियों को बारह करोड़ से ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत से डेटा चोरी से कंपनियों को भारी नुकसान हो रहा है और इनका घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है।
गौरतलब है कि पिछले महीने अमेरिका ने अपने नागरिकों के निजी डेटा लीक करने के मामले में फेसबुक पर करीब चौंतीस हजार करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया था। इसके बाद पूरी दुनिया में डेटा सुरक्षा एवं डेटा स्थानीकरण के मुद्दे पर बहस छिड़ गई। दुनिया के कई विकासशील देशों में इन मुद्दों पर नए कानून बनाए जाने की तैयारी भी हो रही है। पिछले दिनों टिक टॉक के स्वामित्व वाली चीन स्थित कंपनी बाइट डांस ने भारत में एक डेटा केंद्र खोलने का फैसला किया है, जो देश में किसी विदेशी कंपनी का भारत में इस तरह का पहला कदम है। अब फेसबुक, गूगल, ट्विटर जैसी अमेरिकी सोशल मीडिया कंपनियों पर भारत में डेटा केंद्र स्थापित करने का दबाव बढ़ गया है। भारत सरकार द्वारा डेटा स्थानीकरण पर प्रस्तावित डेटा संरक्षण विधेयक के मद्देनजर वैश्विक कंपनियों द्वारा भारत में डेटा केंद्र बनाने की संभावनाएं बढ़ गई हैं।
जून के आखिर में जापान के शहर ओसाका में जी-20 सम्मेलन के दौरान डेटा स्थानीकरण और डेटा सुरक्षा पर अपना रुख साफ करते हुए भारत ने कहा कि डेटा कच्चे तेल की तरह एक ऐसी संपत्ति है जिस पर विकासशील देशों के हितों का ध्यान रखा जाना जरूरी है। साथ ही डेटा पर विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों के हिसाब से बातचीत की जानी चाहिए। जी-20 सम्मेलन के इतर भी भारत के प्रधानमंत्री ने अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ वार्ता में भी डेटा स्थानीकरण के मुद्दे पर पीछे न हटने की बात कही थी। वस्तुत: डेटा स्थानीकरण किसी देश के नागरिकों और उपभोक्ताओं से संबंधित डेटा को उसी देश की सीमाओं के भीतर संग्रहित करने की प्रक्रिया है। इससे उस देश की सरकार का डेटा पर बेहतर नियंत्रण रहता है और डेटा का दुरुपयोग भी रुकता है।
पिछले दिनों भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) ने दिशानिर्देश जारी करते हुए स्पष्ट किया था कि भारतीय उपभोक्ताओं के लेन-देन के डेटा भारत में ही रखे जाएंगे। यदि भारत से संबंधित उपभोक्ताओं के भुगतान की प्रक्रिया विदेश में होती है तो वहां उससे संबंधित डेटा को एक कारोबारी दिन या चौबीस घंटे के भीतर भारत भेजा जाना जरूरी होगा, ताकि भारतीयों से संबंधित लेन-देन के डेटा को केवल भारत में ही रखा जा सके। वस्तुत: नई वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के तहत भविष्य में डिजिटल कारोबार तेजी से बढ़ेगा और जिस देश के पास जितना ज्यादा डेटा संरक्षण होगा, वह देश आर्थिक रूप से उतना मजबूत होगा।
जापान के शहर फुकुओका में आयोजित जी-20 देशों के वित्त मंत्रियों और दुनिया के शीर्ष वित्तीय नीति निर्माताओं की शिखर बैठक में डिजिटल वैश्विक उद्योग-कारोबार पर डिजिटल कर लगाने को लेकर आम सहमति बनी। इस सहमति के मद्देनजर डिजिटल वैश्विक व्यापार करने वाले उद्योग-कारोबार पर एक सामान्य कराधान व्यवस्था लागू की जा सकेगी, जो सभी देशों में समान रूप से स्वीकार्य हो सकेगी। दुनिया के अधिकांश देश डिजिटल कारोबार करने वाले उद्यमों पर डिजिटल टैक्स लगाने का समर्थन कर रहे हैं लेकिन अमेरिका सहित दुनिया के कुछ विकसित देशों की प्रमुख डिजिटल कंपनियां इस नए प्रस्ताव के खिलाफ हैं। स्थिति यह है कि विकासशील देशों में बड़े पैमाने पर डिजिटल कारोबार करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां कर बचाने के लिए अपने वास्तविक कारोबार का एक बड़ा हिस्सा कम कर लगाने वाले देशों में हस्तांतरित करती हैं। इससे उन देशों को राजस्व की भारी हानि होती है जहां वास्तविक कारोबार किया जाता है। इसलिए जी-20 देशों के वित्त मंत्रियों द्वारा पारित ताजा प्रस्ताव या तो ऐसे अर्जित लाभ पर एक साझा न्यूनतम टैक्स लागू कर सकता है या फिर यह ऐसी अंतरराष्ट्रीय सहमति बनाई जा सकती है जिससे ऐसे अर्जित लाभ पर उन देशों पर कर लगेगा जहां वास्तविक राजस्व प्राप्ति हुई है। जी-20 के तहत 2020 तक डिजिटल कर सुनिश्चित किए जाने का प्रस्ताव लागू हो जाने पर दुनिया में डिजिटल कारोबार के भविष्य की दिशा बदल जाएगी। वैश्विक डिजिटल कारोबार पर एक उपयुक्त कर लगाने से भारत और दक्षिण अफ्रीका जैसे कई विकासशील देशों को फायदा होगा।
इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत में डेटा सुरक्षा और डेटा स्थानीकरण से जहां अर्थव्यवस्था को फायदा होगा, वहीं उपभोक्ताओं को भी इसका लाभ मिलेगा। रोजगार के मौके भी बढ़ेंगे। दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई भारतीय अर्थव्यवस्था में बहुराष्ट्रीय कंपनियां तेजी से डिजिटल कारोबार बढ़ा रही हैं। भारतीय मध्यम वर्ग की ताकत पर भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई है। ऐसे में बढ़ते हुए वैश्विक डिजिटल कारोबार का लाभ भारतीय अर्थव्यवस्था को और आगे बढ़ा सकेगा। हाल ही में 'डिजिटल इंडिया टेक्नोलॉजी टू ट्रांसफॉर्म ए कनेक्टेड नेशनÓ में यह तथ्य उभर कर आया है कि भारत डिजिटलीकरण और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के माध्यम से डिजिटल कारोबार की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारत में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या देश की करीब आधी आबादी के करीब हो गई है और इस परिप्रेक्ष्य में भारत दुनिया में अब चीन के बाद दूसरे स्थान पर आ चुका है।
भारत में वैश्विक डिजिटल कारोबार बढऩे के और भी कई कारण हैं। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2014 के बाद छत्तीस करोड़ जन-धन खाते खुले हैं और पच्चीस करोड़ रुपे कार्ड जारी हुए हैं। पिछले पांच साल में मोबाइल बैंकिंग से लेन-देन पैंसठ गुना बढ़ा है। खासतौर से आधार और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के कारण भारत में डिजिटल क्रांति और तेज हुई है। जीएसटी लागू होने के बाद एक करोड़ औद्योगिक एवं कारोबारी इकाइयां कर-भुगतान के लिए डिजिटल माध्यम का उपयोग कर रही हैं। उपभोक्ता समझ गए हैं कि डिजिटल बाजार उनके लिए कितने लाभप्रद है।
उपभोक्ताओं के निजी डेटा लीक होने पर फेसबुक पर भारी जुर्माना लगने के बाद अब भारत को भी अपने नागरिकों के हित में डेटा सुरक्षा और डेटा स्थानीकरण पर नया कानून बनाने की जरूरत है। जिस तरह से फ्रांस ने अमेरिकी सरकार के भारी विरोध के बावजूद फेसबुक, एपल और अमेजन जैसी कंपनियों पर डिजिटल कर लगाए हैं उसी प्रकार भारत सरकार को भी भारतीय उपभोक्ताओं का डेटा इस्तेमाल करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर डिजिटल कर लगाने के बारे में विचार करना होगा। तभी डेटा स्थानीकरण भविष्य में भारत के लिए कच्चे तेल के भंडार की तरह उपयोगी होगा और भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में प्रभावी योगदान भी दे पाएगा।