उपकार की महत्ता को दर्शाती है कृतज्ञता
   Date14-Aug-2019

धर्मधारा
लो गों को यह बताना कि आप उनके आभारी हैं, केवल एक अच्छी बात या अच्छी आदत ही नहीं है, बल्कि यह दूसरे व्यक्ति से एक प्रकार का भावनात्मक संपर्क भी है, जिसकी हमें अपने मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए आवश्यकता पड़ती है। लोग यह जानना चाहते हैं कि जो वे कर रहे हैं, उस पर कितना ध्यान दिया जाता है और उसकी कितनी सराहना होती है। धन्यवाद मिलने पर सामने वाला व्यक्ति दोगुने उत्साह से उस काम को करने का प्रयास करता है। जब आप किसी को धन्यवाद बोलते हैं, तो सामने वाले की नजर में आपकी इज्जत भी बढ़ती है और वह अपने व्यवहार से प्रभावित होकर आगे भी किसी की मदद करने को तैयार रहता है। हमारे वेद, पुराणों और शाों में भी धन्यवाद के बारे में बहुत विस्तार से वर्णन है। हम यह मानते हैं कि भगवान सर्वशक्तिमान हैं और उनकी कृपा से ही यह संसार बना है और चल रहा है। हम स्वयं भी परमात्मा के प्रति कृतज्ञ होते हैं, अपना आभार व्यक्त करते हैं। हम अपने दैनिक जीवन में जो भी भगवान की पूजा-आराधना करते हैं, यह उन्हें धन्यवाद करने का ही एक जरिया है और उनसे अपने जीवन के लिए मार्गदर्शन की प्रार्थना है।
धन्यवाद में निहित कृतज्ञता के अभाव में हम अन्य चीजों पर अपना अधिकार मानकर बैठ जाते हैं संतोष का अभाव तथा अनवरत और पाने की लालसा हमें कृतज्ञ होने से रोकती है। कृतज्ञताज्ञापन से पहले हमें अक्सर कर्म या कृपा के परिणामों के उद्घाटित होने तक के लिए प्रतीक्षा पर बल देते हैं, यह विश्वास और आस्था की एक कमी का संकेत देता है और हमें उसी रूप में वापस मिलता है। कृतज्ञता हमें दूसरों के उपकार को समझाने में एक तरह से हमारी मदद करती है। धन्यवाद देने के लिए हमें किसी विशेष अवसर को खोजने के बजाय छोटे-छोटे अवसरों की तलाश करनी चाहिए।