रोबोट और मानवीय व्यवहार...
   Date13-Aug-2019

जिस तरह से विज्ञान और तकनीक का दायरा तेजी से बढ़ रहा है, उसी के साथ भांति-भांति के सवाल, शंका और तमाम तरह के किन्तु, परन्तु भी विस्तारित होते जा रहे हैं... कुल मिलाकर कहे तो मानव जीवन तकनीक, आश्रित और रोबोट केन्द्रित होता जा रहा है... अगर यह कहा जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि आजकल तो मनुष्य के बहुत सारे काम रोबोट के दायरे में आ चुके हैं... विदेशों में तो होटल में अनेक जगह रोबोट को ही परोसगारी के रूप में इस्तेमाल का चलन बढ़ रहा है... फिर क्या भविष्य में फिल्मी दुनिया की भांति रोबोट के एकक्षत्र राज करने या उनके जरिये मानव जाति पर संकट मंडराने की स्थितियां नहीं बनेगी..?
बच्चे जब खेलते हैं, तो उनके गुड्डे-गुडिय़ा उन्हीं की तरह के होते हैं... यहां तक कि उनके खिलौनों के घर, बर्तन और कपड़े भी... बच्चों के मामले में हम इसकी वजह अक्सर यह मान लेते हैं कि उन्हें बाहर की दुनिया का बहुत ज्यादा तजुर्बा नहीं होता और उनकी सोच का दायरा भी बहुत सीमित होता है... लेकिन वे बड़े, जिनका तजुर्बा भी बहुत ज्यादा होता है और जो सोच के बड़े दायरे का दावा करते हैं, वे भी कुछ बेहतर नहीं बनाते... कम से कम आजकल दुनिया में बन रहे रोबोट को देखकर तो यही कहा जा सकता है... इसके लिए एक अच्छा उदाहरण दिया जाता है... आप गूगल सर्च के इमेज विकल्प में जाएं, वहां रोबोट टाइप करें और फिर जितनी छवियां दिखाई देंगी, ज्यादातर श्वेत वर्ण के लोगों की होंगी... ज्यादातर रोबोट चूंकि पश्चिमी देशों, जापान या कोरिया वगैरह में बन रहे हैं, इसलिए अश्वेत लोगों जैसे दिखने वाले रोबोट कहीं नहीं हैं... कहा जा सकता है कि हम अपने आस-पास जैसे लोगों को देखते हैं, वैसे ही रोबोट बना देते हैं... पर बात शायद इतनी सरल नहीं है... अमेरिका में भी श्वेत रोबोट ही बन रहे हैं, जबकि वहां की आबादी का एक स्पष्ट दिखने वाला हिस्सा अश्वेतों का है, जो देश के लगभग हरेक क्षेत्र में सक्रिय हैं... यहां तक कि राष्ट्रपति पद तक की शोभा बढ़ा चुके हैं, फिर भी वहां ऐसे रोबोट नहीं बनाए जा रहे, जो दिखने में अश्वेत जैसे हों... बेशक इसका कारण हमारे सामाजिक और सौंदर्य के पूर्वाग्रह हैं...
इसके बाद हम यह आसानी से कह सकते हैं कि रोबोट भले ही न मानवीय चीज हैं और न सामाजिक, लेकिन समाज की बहुलता रोबोट में भी दिखनी चाहिए... ऐसा हुआ तो क्या होगा..? पिछले दिनों न्यूजीलैंड की ह्यूमन इंटरफेस टेक्नोलॉजी लेबोरेटरी ने इसे लेकर एक दिलचस्प प्रयोग किया... उसने तरह-तरह के रोबोट वाला एक कंप्यूटर गेम बनाया, जिसमें खेलने वाले को रोबोट को चुन-चुनकर गोली मारनी होती है... वे जिसे चाहें, गोली मार सकते हैं और जिस चाहें, छोड़ सकते हैं... यह गेम बहुत से लोगों को खेलने के लिए दिया गया और उनके खेलने के तरीके को रिकॉर्ड में दर्ज किया गया... पता लगा कि बहुत से लोगों ने श्वेत रोबोट को तो छोड़ दिया, लेकिन किसी भी अश्वेत रोबोट को नहीं बख्शा... यह गेम बताता है कि हमारे पूर्वाग्रहों का निशाना हमारी दुनिया तक ही सीमित नहीं रहता, यह तकनीक और रोबोट की दुनिया तक जाता है...
यहां यह कहा जा सकता है कि यह उस गेम की बात है, जहां खेल गोली मारने का था, जबकि हकीकत में हमें रोबोट से लडऩा नहीं होता, उसकी सेवाओं का इस्तेमाल करना होता है... लेकिन तमाम अध्ययन ऐसा नहीं बताते... कई सर्वेक्षणों में यह बात सामने आई है कि अक्सर लोग अपना गुस्सा और अपनी कुंठा रोबोट पर उतारते हैं... कुछ उन्हें गालियां देते हैं, तो कुछ उन्हें बेसबॉल बैट से पीट देते हैं, कई और तरह के दुव्र्यवहार भी दर्ज किए गए हैं... लेकिन रोबोट के साथ यह सब किया जाता है, क्योंकि इसमें कानून तोडऩे या जेल जाने का डर नहीं होता... यहीं पर वह सवाल उठता है, जिसे पिछले कुछ साल से तकनीक के एथिक्स की दुनिया में पूछा जा रहा है- जिन्हें हमने मानव की तरह बनाया है, उनसे हमारा व्यवहार मानवीय क्यों नहीं होता..? और क्या हम उन्हें मानव अधिकार भी देंगे..? इससे जुड़े और भी मुद्दे हो सकते हैं... क्योंकि जब मानवीय व्यवहार में प्रत्येक व्यक्ति को अपने अधिकार नहीं मिल पा रहे हैं, तब मशीन या तकनीकी यंत्र के जरिये जो लाभ हम लेना चाहते हैं, उसको वापस लौटाने का मानवीय स्वभाव शनै: शनै: ही सही खत्म तो हो रहा है... फिर जब ऐसी स्थिति बनेगी तो क्या होगा..?