विकास को रोक दुश्मन का हथियार था अनुच्छेद 370
   Date13-Aug-2019

जयकृष्ण गौड़
ऋ षि कश्यप की तपोभूमि कश्मीर, जिसके कण-कण में सांस्कृतिक विरासत की झलक मिलती है, जहां आद्य शंकराचार्य एवं देवी-देवता के प्राचीन मंदिर है, मंदिरों के अवशेष आज भी हमलावरों की बर्बरता की गवाही दे रहे है, हमारी सांस्कृतिक विरासत को मिटाने की जिन्होंने कोशिश की ऐसी क्रूरता यदि अन्य देश में होती तो उसका नामो निशान मिट जाता, लेकिन हमारी संस्कृति ऐसी मृत्युंजय है कि जिसे हमलावरों के अत्याचार भी नहीं मिटा सके। राजनैतिक आजादी के बाद भी सांस्कृतिक आजादी का संघर्ष अभी जारी है। राम जन्मभूमि का मामला 134 वर्षों से चल रहा है लेकिन आज भी इस मामले को निर्णय तक पहुंचाने में बाधा पैदा की जा रही है। इस इतिहास से सब परिचित है कि पहले गृहमंत्री सरदार पटेल की दृढ इच्छा शक्ति से पांच सौ से अधिक रियासतों का भारत संघ में विलय हो गया है। हैदराबाद के नवाब ने भारत के साथ विलय में आनाकानी की तो सैनिक कार्रवाई से उसकी अकड़ निकल गई। जूनागढ़ के नवाब ने अपना रिश्ता पाकिस्तान के साथ जोडऩा चाहा लेकिन सरदार पटेल के तेवर देखकर उसे अपने कुत्तों के साथ भागना पड़ा, इसी इच्छा शक्ति के कारण सरदार पटेल को लौहपुरुष कहा जाता है। कश्मीर का मामला पं. नेहरू के पास था, जम्मू -कश्मीर के राजा हरिसिंह को जब लगा कि पाकिस्तान की ओर से कबाइली हमला हो गया है तो उन्होंने विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। इस इतिहास का उल्लेख कम होता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक पूज्य गुरुजी को सरदार पटेल ने सरकारी विमान से राजा हरिसिंह को भारत में विलय के लिए राजी करने भेजा था। पूज्य गुरुजी ने महाराजा को पाकिस्तान की बर्बरता का आभास कराया और वे विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने को राजी हो गए। विडंबना यह रही कि पं. नेहरू ने शेख अब्दुल्ला की दोस्ती के मोह में कश्मीर के मामले को न केवल राष्ट्र संघ में उलझाया और कबाइलों को खदेड़ते भारतीय सैनिक जब आगे बढ़ रहे थे तो उनके बढ़ते कदम रोक दिए गए। इसलिए कश्मीर के एक तिहाई भू-भाग पर पाकिस्तान काबिज हो गया इसे पीओके कहा जाता है। कश्मीर समस्या के जड़ में पं. नेहरू की राष्ट्रघाती नीति रही है, इसी से आतंकवाद पनपा। आतंकी हिंसा से कई लोग मारे गए और आतंकियों का मुकाबला करते हुए भी कई सुरक्षा जवान शहीद हुए। 1948 से आज तक मारे गए लोगों कि संख्या चालीस हजार से अधिक है। अनुच्छेद 370 एवं 35(ए) के प्रावधानों को समाप्त करने के विधेयक पर चर्चा करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने सवाल किया कि बड़ी संख्या में मारे गए लोगों के लिए जिम्मेदार कौन है। आजादी के बाद पं. नेहरू ने ही अनुच्छेद 370 को लागू किया। अलगाववादी परिवारवाद और अलगाववाद से कश्मीर आतंकियों का अड्डा बन गया। बाद में अनुच्छेद 370 के साथ 35(ए) को जोड़ दिया गया। सन् 1953 में एक देश में दो विधान, दो निशान और प्रधान नहीं चलेंगे के उद्घोष के साथ डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी जम्मू क्षेत्र की सभा में कहा कि मैं आपको संविधान दूंगा या जीवन का बलिदान दे दूंगा। शेख अब्दुल्ला की सरकार ने डॉ. मुखर्जी को जेल में डाल दिया, वहीं उनका आकस्मिक निधन हो गया। अचानक हुई मृत्यु के कारणों की सच्चाई आज तक लोगों के सामने नहीं आई। अब्दुल्ला और पं. नेहरू के बाद इंदिराजी से लेकर राजीव गांधी तक अनुच्छेद 370 को बनाए रखने के पक्ष में रहे आज भी सोनिया,राहुल की कांगे्रस, हाल ही में पुन: सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बनाया गया है। इस समय देश में राष्ट्रवादी चेतना है। मोदी सरकार ने साहसिक कदम उठाते हुए अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटाने और जम्मू-कश्मीर राज्य के पुनर्गठन विधेयक जब राज्यसभा में प्रस्तुत किया तो भाजपा विरोधी सकते में आ गए।
कांग्रेस के नेता गुलाब नबी आजाद को ऐसा लगा कि मानों यह बम का धमाका है। कांग्रेस ने इस विधेयक का विरोध किया। कांग्रेस में भी दो धड़े दिखाई दिए। करीब एक दर्जन कांग्रेसी नेताओं ने 370 हटाने का समर्थन किया। डॉ. कर्णसिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जर्नादन द्विवेदी आदि नेताओं ने 370 को हटाने के निर्णय को राष्ट्र हित में बताया। कांग्रेस की शर्मसार स्थ्ििात तब पैदा हुई जब राज्यसभा में व्हिप जारी करने की जिम्मेदारी भुवनेश्वर कातिया को दी गई थी, लेकिन उन्होंने 370 को हटाने को राष्ट्र हित में बताते हुए सदन से बाहर चले गए। कांग्रेस में दो प्रकार के विचार के नेता है, जिनके चिंतन में राष्ट्र है वे 370 को हटाने के समर्थन में है, जो टुकड़े-टुकड़े गैंग और भारत तेरे टुकड़े होंगे की बात करने वालों के समर्थन में खड़े है, ऐसे कांग्रेसी कम्युनिस्ट इस विधेयक के विरोध में है। आश्चर्य तो यह है कि मेहबूबा मुफ्ती जो यह धमकी देती है कि यदि 35(ए) को हटाया तो तिरंगे को कंधा देने वाला कोई नहीं मिलेगा, आग लग जाएगी। अनुच्छेद 370 और 35(ए) को संसद ने भारी बहुमत से समाप्त कर दिया है। न आग लगी और न धुआं निकला। जिस तरह पं. नेहरू ने शेख अब्दुल्ला की दोस्ती के चक्कर में 370 को लागू किया अब भी सोनिया राहुल की कांग्रेस उसी नेहरूवादी राष्ट्र विरोधी नीति का अनुसरण कर 370 को हटाने के विरोध में खड़ी है। आज कांग्रेस अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही है। यदि अब भी उसी घिसी-पिटी सेकूलर नीति रही तो जनता ऐसे दल और नेतृत्व को कभी बर्दाश्त नहीं कर सकती। जो देश विरोधी लोगों के साथ खड़ी रहे ऐसी कांग्रेस शीघ्र की इतिहास में सिमट जाएगी। यह सच्चाई है कि 370 से केवल दो-तीन परिवारों का जम्मू-कश्मीर राज्य पर कब्जा रहा है। 370 हटाने के औचित्य और जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के विकास के रोडमेप को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राष्ट्र के नाम संदेश से समझा जा सकता है। उन्होंने कहा कि आपने हमने पूरे देश ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया है। ऐसी व्यवस्था जिसकी वजह से जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के भाई-बहनें अनेक अधिकारों से वंचित थे। जो उनके विकास में बड़ी बाधा थी। वो अब हट गई है। जो सपना सरदार पटेल, बाबा साहेब आम्बेडकर, डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का था जो अटलजी और करोड़ों देशवासियों का था, वह अब पूरा हुआ है।
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में नए युग की शुरुआत हुई है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 370 और 35(ए) ने जम्मू-कश्मीर को अलगाववाद, आतंकवाद, परिवारवाद और व्यवस्था में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के अलावा कुछ नहीं मिला। इन दोनों अनुच्छेद का देश के खिलाफ कुछ लोगों की भावनाएं भड़काने के लिए पाकिस्तान द्वारा एक शस्त्र के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था। इसकी वजह से पिछले तीन दशक में लगभग 42 हजार लोगों को अपनी जाने गंवानी पड़ी। इनके हटने से जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लोगों का भविष्य तो सुधरेगा ही उनका भविष्य भी सुरक्षित होगा। विश्वसनीय नेतृत्व की बातों का असर होता है। जम्मू-कश्मीर राज्य के पुनर्गठन से अब लद्दाख केन्द्र शासित रहेगा। जम्मू-कश्मीर में कुछ दिनों तक राष्ट्रपति शासन रहेगा। प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया है कि स्थिति सामान्य होते ही जम्मू-कश्मीर के पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाएगा। 370 को खत्म किया तो घाटी में आग लग जाएगी। ऐसे नेताओं का मुंह उस समय बंद हो गए, जब घाटी की स्थिति भी सामान्य होने लगी है, जुम्मे की नमाज भी शांति से सम्पन्न हुई। न किसी ने पत्थर फेंके और न किसी ने भारत विरोधी नारे लगाए। सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल भी लोगों के बीच जाकर समझाईश दे रहे है।
जिस तरह दो तिहाई से अधिक सदस्यों के समर्थन से 370 को समाप्त करने और राज्य पुर्नगठन विधेयक को समर्थन मिला, उससे स्पष्ट है कि इस ऐतिहासिक निर्णय के साथ पूरा देश खड़ा है। भाजपा के प्रखर विरोधी आम आदमी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी ने भी विधेयक का समर्थन किया। बीजू जनता दल भी भाजपा के साथ खड़ा दिखाई दिया। 370 के खात्मे से जम्मू के लोगों ने खुशी जाहिर करते हुए जश्न मनाया। लद्दाख ने भी राष्ट्र ध्वज फहराते हुए विजय उत्सव मनाया। केवल घाटी के कुछ मुस्लिम ही शांत थे, उनके चेहरे पर न खुशी थी और न गम था। सवाल यह है कि अनुच्छेद 370 हटने से घाटी का सबसे अधिक विकास होगा। फिर वहां खुशी का उत्सव क्यों नहीं? देश के सुख-दुख के साथ यह वर्ग खड़ा क्यों नहीं होता। इस सवाल में ही कई संदेह है। जिस तरह देश का अधिकांश मुस्लिम देश के साथ खड़ा है उसी तरह घाटी का मुस्लिम भी राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड़ेगा तो उन्नति को सुनिश्चित करेगा। विकास की ऊंचाई की ओर जब जम्मू-कश्मीर बढ़ेगा। जब केसर की महक से घाटी महकेगी। समस्या है केवल राष्ट्र की मुख्यधारा से समरस होने की। अनुच्छेद 370 के मिटने से न केवल विकास सुनिश्चित होगा बल्कि दिल भी मिलेंगे। सबकी एक राष्ट्रीय पहचान होगी। इस सवाल पर भी बहस हुई कि 370 के रहने से कश्मीरियत प्रभावित होगी। इसका सटीक उत्तर संसद में गृहमंत्री अमित शाह ने दिया। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र और गुजराती आदि राज्यों की अलग भाषा और अलग पहचान है। इसलिए कश्मीरियत की पहचान भी अधिक सुरक्षित रहेगी। विविधता के बीच भी संस्कृति आधारित एकात्मता के भाव रहते है। अपना देश अपनी माटी के भाव जागृत रहे तो फिर अलगाव की स्थिति नहीं हो सकती। फिर न कोई दुश्मन भारत को आंख दिखा सकेगा। (लेखक - वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं)