सुखी दाम्पत्य जीवन का सूत्र संयम व सहिष्णुता
   Date13-Aug-2019

धर्मधारा
को ई भी इंसान पूर्ण नहीं होता। पति-पत्नी के रूप में दांपत्य जीवन में दोनों की अपनी-अपनी मानवीय दुर्बलताएं हो सकती हैं। ईश्वर के सिवाय कोई भी सर्वगुण संपन्न इस धरती पर नहीं हो सकता। अत: दूसरे से ऐसी आशा करना बेमानी होगी। प्राय: व्यक्ति बढ़ी-चढ़ी आशा-अपेक्षाओं के कारण रिश्तों में खटास पैदा करता है और अनावश्यक असंतोष को ढोए फिरता है। इस संदर्भ में आचार्यश्री का संयम-सहिष्णुता का सूत्र कारगर सिद्ध होता है। इसके आधार पर यदि एक-दूसरे की खूबियों व गुणों पर ध्यान केंद्रित किया जाए तो एक दूसरे से संतुष्ट व खुश रहने के कितने ही आधार तैयार हो सकते हैं और एक सुखी-संतुष्ट दांपत्य जीवन का आधार खड़ा हो सकता है, जो कालांतर में अपने सौम्य-सात्विक एवं आध्यात्मिक वातावरण के साथ नररत्नों की खदान साबित हो सकता है। आवश्यकता इस संदर्भ में आपसी दूरदर्शितापूर्ण आचार एवं व्यवहार की है। व्यक्ति की सबसे बड़ी भूख सम्मान और प्यार की होती है। थोड़ा-सा सम्मान और थोड़ा-सा अपनापन मिलते ही व्यक्ति गहरी तृप्ति का एहसास करता है। दांपत्य जीवन के संबंध में भी यह सत्य है। जन्म दिवस, विवाह दिवस जैसे अवसरों पर कुछ विशिष्ट उपहारों के साथ इनका इजहार किया जा सकता है। प्रतिपक्ष की मनपसंद चीजों के उपहार के साथ अपना स्थान बनाया जा सकता है। हम आपका ध्यान रखते हैं, यह एहसास असर करता है और दांपत्य जीवन में गहरे संतोष एवं विश्वास का रंग घोलता है। यहां महत्वपूर्ण है कि अपनी महत्वाकांक्षाओं को दूसरों पर थोपें नहीं, बल्कि एक-दूसरे की योग्यता का सम्मान करते हुए एक-दूसरे को आगे बढऩे में सहायता प्रदान करें। साथ ही बिना अधिक आशा-अपेक्षा के एक-दूसरे की सेवा करें। आपसी सम्मान और प्यार का भाव परिवार में ऐसा वातावरण तैयार करेगा, जिसकी छांह तले विकसित हो रहा शिशु मन भावनात्मक स्थिरता एवं दृढ़ता लिए विकसित होगा।