लिंचिंग के नाम पर दुष्प्रचार एक षड्यंत्र का हिस्सा
   Date12-Aug-2019

'को ई पत्थर से न मारे मेरे दीवाने कोÓ यह गीत गाते हुए लैला अपने मजनू के शरीर पर बिछ जाती है उसे मॉब लिंचिंग से बचाने के लिए। पत्थर मार-मार कर मजनू की हत्या कर देने की पत्थरबाजों की मानसिकता से बचाने के लिए लैला, मजनू पर हो रही पत्थरबाजी को स्वयं के शरीर पर ले लेती है। 'लैला-मजनूÓ फिल्म का यह दृश्य मॉब लिंचिंग के स्रोत की ओर इशारा करती है। मॉब लिंंचिंग का समाानार्थी शब्द संस्कृत या हिंदी भाषा में नहीं है। क्योंकि किसी की हत्या का यह व्यवहार भारत की संस्कृति का कभी भी अंग नहीं रहा। भारत में न्याय शास्त्र अति प्राचीन है। न्याय की परिपाटी अत्यंत प्राचीन है। धर्म के अनेक तत्वों में एक प्रधान तत्व न्याय है। न्याय का विषद वर्णन वेदों मेंं है। सनातन परिपाटी के छ: दर्शन में एक दर्शन 'न्याय दर्शनÓ है जिसके प्रतिपादक गौतम ऋषि माने जाते हैं। जहाँ भारत में न्याय को प्रतिष्ठापित किया गया वहीं भारत में अहिंसा और जीव दया की भी एक प्राचीन परंपरा रही है। दया, करुणा, ममता, संवेदना, सहानुभूति भारत में धर्म के अंग माने जाते रहे हैं। और इनको जीवन में व्यवहार बनाकर जीवन जीने वाले लोगों को हिन्दू समाज सदियों से अधिक प्रतिष्ठा देकर प्रोत्साहित करता रहा है। इस प्रतिष्ठा का उच्चतम प्रमाण आपको तब मिलेगा जब भारत का नागरिक अपने ईश्वर को दयानिधान, दयामन्त, करुणानिधान, भक्तवत्सल, शरणागतवत्सल कहकर पुकारता है। दीन-दुखियों के पालनहारी, दीनानाथ कहककर पुकारता है। ऐसा भावप्रधान, संवेदनशील, अहिंसक व न्यायवादी हिन्दू समाज किसी की हत्या भीड़ जुटाकर करेगा इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है।
मॉब लिंचिंग स्पष्ट रूप से विदेशी बर्बरता के चरित्र से पनपा हुआ हिंसक क्रूर व्यवहार है जिसकी जड़ें ओल्ड टेस्टामेंट में हैं। वहीं से यह हिंसक व्यवहार यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका और अरब के देशों में प्रचलित हुआ। उन देशों में कानून प्रक्रिया का अंग बना और रिलीजन व मजहब के व्यवहार में भी सम्मिलित हुआ। ओल्ड टेस्टामेंट के डीयूटेरोनॉमी नामक 21 वें चैप्टर में सामूहिक हत्या, हिंसा व अपराध के मजहबी प्रकार का वर्णन है। इसी व्यवस्था के अनुरूप यूरोप में क्रूसेड का जन्म हुआ तो अरब में जिहाद का चलन हुआ। भीड़ द्वारा सुनियोजित सामूहिक हत्या-व्यवस्था के अनेक स्वरूप अरब और पश्चिमी देशों के इतिहास में मिलते हैं। अमेरिका के स्टेट ऑफ वरजीनियाँ में चाल्र्स लिंच और विलियम लिंच के द्वारा ओल्ड टेस्टामेंट की इसी व्यवस्था के अनुरूप अपराध के आरोपों पर भीड़ द्वारा सामूहिक हत्या की परिपाटी आरम्भ की गई। स्वघोषित जज विलियम लिंच के द्वारा यह न्याय की परिपाटी आरम्भ हुई। जिसको चाल्र्स लिंच ने 1782 में 'लिंच लॉÓ के नाम से वर्णित करते हुए कहा कि उनके सहयोगी ने इसके माध्यम से टोरिस और नीग्रो लोगों को निपटाया।
(Waldrep, Christopher (w®®{). "Lynching and Mob Violence". In Finkleman, Paul (ed.).Encyclopedia of African American History v{v~–v}~z. w. New York City: O&ford University Press. p. x®}.)
ब्रिटेन से गए हुए श्वेत प्रवासियों ने अमेरिका में अश्वेत लोगों की हत्या के लिए लिंचिंग की प्रक्रिया आरम्भ किया। बताया जाता है 1882 से 1951 तक 69 वर्षों में सरकारी आँकड़ों के अनुसार 3437 अश्वेत लोगों की मॉब लिंचिंग हुई जबकि प्रत्युत्तर में 1293 श्वेत लोगों की मॉब लिंचिंग हुई। ("रु4ठ्ठष्द्धद्बठ्ठद्दह्य: क्च4 स्ह्लड्डह्लद्ग ड्डठ्ठस्र क्रड्डष्द्ग, 1882-1968". ठ्ठद्ब1द्गह्म्ह्यद्बह्ल4 शद्घ रूद्बह्यह्यशह्वह्म्द्ब-्यड्डठ्ठह्यड्डह्य ष्टद्बह्ल4 स्ष्द्धशशद्य शद्घ रुड्ड2. ) ऐसी लिंचिंग की घटनाओं और श्वेत-अश्वेत की रंगभेदी घृणा के मध्य अश्वेतों की राजनीतिक भागीदारी रोक दी गई और जब लोकतंत्र ने स्वरूप लेना आरम्भ किया तब उन्हें मताधिकार नहीं दिया गया। ब्रिटेन में तो 1833 में द एमेनिसिपेशन एक्ट के माध्यम से श्वेत बहुलता वाले समाज में अश्वेतों की भागीदारी पर रोक लगा दिया गया था। ब्रिटेन के लोग अफ्रीका में जाकर बसे तो वहाँ भी अफ्रिकन्स के साथ मॉब लिंचिंग किया गया। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भी मॉब लिंचिंग इनके साथ साथ गया। दक्षिण अफ्रीका में इसी रंगभेदी लिंचिंग की मानसिकता के विरुद्ध नेलशन मंडेला का बहुत लंबा संघर्ष चला जो विश्व इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस रंगभेदी घृणा से संचालित मॉब लिंचिंग की परिपाटी ने ही पश्चिमी देशों में गुलामी की परंपरा को जन्म दिया। और दासों की खरीद बिक्री आरम्भ हुई। उन देशों में मनुष्य मरने से अच्छा गुलाम बन जाना और खरीद बिक्री की वस्तु बन जाने को स्वीकार करने की त्रासद स्थिति में आ गया। यह गुलामी की प्रथा का चलन अरब के देशों में भी रहा। युद्ध बंदी भी गुलामों की भाँति उपयोग किये जाते थे उन दिनों। अमेरिका में चलाया गया कु क्लक्स क्लान (्य्य्य) भी श्वेत प्रभुत्व के लिए संचालित, संगठित मॉब लिंचिंग का ही आंदोलन था। हिटलर की तानाशाही भी लोगों की क्रूरतम सामुहिक हत्या के कारण ही विश्व इतिहास में जाना जाता है। मॉब लिंचिंग के उसी दौर में यूरोप में लिंचर्स के नए समुदाय का जन्म हुआ जिसे माक्र्सवाद के नाम से जाना जाता है। इन लोगों ने हथियार बंद भीड़ के द्वारा इसी प्रकार की लिंचिंग प्रक्रिया चलाया जिसे इन लोगों ने 'विप्लवÓ कहा। यूरोप के अनेक देशों के साथ साथ रसिया और चाईना इससे विशेष रूप से प्रभावित हुए। मार्क्सवादियों का यह विप्लव भी एक प्रकार का मॉब लिंचिंग ही था। मओत्से तुंग के द्वारा चलाया गया माओवादी हिंसा जिससे भारत भी प्रभावित हुआ और झुलसा, उस माओवाद की हिंसात्मक प्रवृति भी एक प्रकार की मॉब लिंचिंग ही है। इस्लाम के आरम्भ में मुहम्मद पैंगम्बर ने उनके चचेरे भाई अली के नेतृत्व में फौज बनाया और एक एक कबीलों को फतह करते हुए अपनी ताकत बढ़ाते चले गए। इस्लाम के प्रसार के साथ ही फौज भी बड़ी होती चली गई। अरब फतह करते तक इनके युद्ध का निश्चित पैटर्न विकसित हो चुका था। यद्यपी इसे फसाद, जंग इत्यादि अनेक नामों से संबोधित करते थे तत्कालीन लोग किन्तु मोहम्मद पैगम्बर ने इस पूरी प्रक्रिया को जिहाद का नाम दिया। यह इंस्ट्रूमेंट ऑफ वॉर कालांतर में अनेक स्वरूप लेता गया। जिसमें हमला करके मारने, भीड़ द्वारा घेरकर मारने, धोखे से मारने, छुप कर मारने, हमले की ताक में घात लगाकर चढ़ाई करने, छल करके मारने, दोस्ती करके मारने इत्यादि कई स्वरूपों का वर्णन मिलता है। यह जिहाद की पूरी प्रक्रिया ओल्ड टेस्टामेंट की व्यवस्था से ही प्रभावित है। मॉब लिंचिंग के कई स्वरूप अरब के देशों में कहीं जिहाद के नाम पर तो कहीं इंसाफ के नाम पर प्रचलित है। ऐसे प्रकरणों में संबंधित व्यक्ति की घेरकर हत्या की जाती है। पत्थर से पिट पिट कर हत्या का विधान तो आज भी कई देशों में प्रचलित है। जहाँ कहा जाता है कि भीड़ इन उपकरणों के माध्यम से इंसाफ करती है। आर्थात वहाँ मॉब लिंचिंग द्वारा की जा रही हत्या को इंसाफ कहा जाता है। अरब के देशों में काफिर लड़कियों, महिलाओं के साथ एक खेल खेला जाता है जिसे तहररूस कहा जाता है।इसमें भीड़ महिला को घेर लेती है। लोग घेरकर नाचते गाते भी हैं। अंदर के घेरे में खड़े लोग महिला को छेड़ते हैं, कपड़े उतारते हैं और सार्वजनिक रूप से उसका खुले में सामूहिक बलात्कार करते हैं। यह भी एक प्रकार की मॉब लिंचिंग है। ऐसी अनेक घटनाएँ कश्मीर में आतंक के आरंभिक दिनों में घटित हुई जब हथियार बंद भीड़ ने इसी प्रकार अनेक बलात्कार किया और अनेक लोगों की ऐसी ही मॉब लिंचिंग के माध्यम से हत्या की गई। भीड़ एकत्र करके घेर कर मारने का यह प्रकार इस्लामिक आतंकवादियों की आतंकी जिहादों में प्राय: देखने को मिला है।