तीन तलाक पर मौलवियों की हायतौबा
   Date01-Aug-2019

चाहे कट्टरपंथी मुस्लिम और भाजपा विरोधी दल तीन तलाक बिल को उलझाकर रखना चाहते हो, इन दलों को भरोसा था कि राज्यसभा में भाजपा का बहुमत नहीं है, इसलिए यह बिल पास नहीं हो सकेगा, जिस तरह मुस्लिम कट्टरपंथियों को तीन तलाक, हलाला पर ठेकेदारी थी, उसी तरह कांग्रेस और अन्य भाजपा विरोधी नेतृत्व के लिए वोट बैंक का सवाल था। इन्हें यह भी आभास हो रहा था कि यदि यह बिल मोदी सरकार पास कराकर तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाने में सफल हो जाती है तो इसका लाभ भाजपा को मिलेगा, लेकिन ये सब उस समय हायतौबा करने लगे, जब राज्यसभा में बहुमत नहीं होने की स्थिति में कुशल मैनेजमेंट से भाजपा ने राज्यसभा में भी तीन तलाक बिल को पास कराकर देश की करीब बीस करोड़ महिलाओं को तीन तलाक की पीड़ा और भय से मुक्त कराया। मोदी सरकार ने जो संकल्प व्यक्त किया, उसे पूरा करके दिखाया। कहा जाता है कि बालहट, राजहट के सामने झुकना होता है, सत्ता के शीर्ष पर स्थापित प्रधानमंत्री श्री मोदी ने लालकिले की प्राचीर से स्वाधिनता दिवस पर कहा था कि हम मुस्लिम महिलाओं को पीड़ा से मुक्त कराएंगे। तीन तलाक बिल दो बार लोकसभा में पास कराया, लेकिन दोनों ही बार राज्यसभा में भाजपा का बहुमत नहीं होने से बिल अटक गया। दो बार मोदी सरकार ने अध्यादेश भी जारी किया। 2019 के चुनाव में भाजपो को प्रचंड जीत मिलने से विपक्ष बिखर गया। इसका लाभ उठाकर भाजपा ने गंभीरता से मैनेज कर तीन तलाक बिल पास करा लिया। पक्ष में 99वें और विपक्ष में 84 मत मिले। बहुमत में यह स्थिति स्पष्ट हो गई कि इस बिल को मोदी सरकार ने गंभीरता से लिया। कांग्रेस के 4, सपा के 6, राकपा के 2, बसपा के 4, टीएमसी के 2, राजद, माकपा के 1-1 सदस्य उपस्थित नहीं रहने से भाजपा के लिए तीन तलाक बिल पर बहुमत का रास्ता साफ हो गया। विपक्ष के 20 सदस्यों ने सदन में उपस्थिति दर्ज नहीं कराई, तो जाहिर है कि कांग्रेस स्वयं बिखरी हुई है, उस पर अनुशासन में रहने को कोई बाध्य नहीं कर सकता। इस बिल के पास होने से मुस्लिम महिलाओं ने जश्न मनाया, जिस कांग्रेस की 60 दशक तक केन्द्र और राज्यों में सरकारें रही, लेकिन तुष्टिकरण के कारण यह संभव नहीं हो सका। क्योंकि ये कथित सेकूलर दल यह मानते थे कि मुस्लिम समाज कट्टरपंथियों के फतवों से चलता है। इसलिए ऐसे कट्टरपंथियों ने मुस्लिम महिलाओं को पीड़ा से मुक्त कराने की कोशिश नहीं की। विपक्ष ने इस बिल को सिलेक्ट कमेटी में भेजने की मांग कर इस बिल को लटकाने की कोशिश की। इस पर भी मतदान हुआ, लेकिन बहुमत से इस मांग को निरस्त कर दिया। इस बिल के पास होने से जाहिर हो गया कि प्रधानमंत्री ने जो कहा, उसे करके बताया।
दृष्टिकोण
लंबे संघर्ष को सलाम
तीन तलाक के खिलाफ पहली आबादी 15 अप्रैल 1966 को गूंजी, जब मुंबई में 7 पीडि़त महिलाओं ने हामिद के साथ मार्च निकाला। इसके बाद 1978-85 में इन्दौर की 62 वर्षीय शाहबानों ने अपने पति से गुजारा भत्ता लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दस्तक दी। सुप्रीम कोर्ट ने गुजारा भत्ता देने के हाईकोर्ट के आदेश को उचित ठहराया, इस पर मुल्ला-मौलवियों ने हायतौबा करते हुए कोर्ट के आदेश को मजहबी मामले में हस्तक्षेप बताया। राजीव सरकार को चेतावनी दी गई। कांग्रेस की राजीव गांधी सरकार ने संसद में बिल पारित कराकर इस निर्णय को बदल दिया। इसके बाद भी इस बिल को लटकाने, भटकाने की कांग्रेस ने पूरी कोशिश की, लेकिन विपक्ष के विरोध के बाद भी यह बिल दोनों सदनों में पास हो गया। राष्ट्रपतिजी के हस्ताक्षर के बाद तीन तलाक के खिलाफ कानून बन जाएगा। तीन तलाक विरोधी कानून में पीडि़त महिला के लिए मजिस्ट्रेट की शर्तों के साथ ही सुलह संभव है। पति से गुजारा भत्ता और बच्चों को कस्टडी मिलेगी। महिला या रिश्तेदार की शिकायत पर बिना वारंट सीधे आरोपी को पुलिस गिरफ्तार कर सकती है। पत्नी का सुनने के बाद ही बेल मिल सकती है। दोषी सिद्ध होने पर पति को तीन वर्ष की सजा का प्रावधान है। जुबानी लिखित, वाट्सअप, ई-मेल, मैसेज से तलाक देना अब गैर कानूनी होगा। मजिस्ट्रेट, महिला, बच्चों का गुजारा भत्ता तय करेंगे। सवाल है इस कानून को मुस्लिम समाज की मान्यता थी। किसी भी कानून का डर होता है, पीडि़त को न्याय के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा मिलती है। शाहबानों से लेकर अब तक मुस्लिम महिलाओं ने संघर्ष किया, परिणाम सामने है।