अब पछताए होत क्या
   Date01-Aug-2019

प्रेरणादीप
ए क बार पांच असमर्थ और अपंग लोग इकट्ठे हुए और कहने लगे-यदि भगवान् ने हमें समर्थ बनाया होता तो बहुत बड़ा परमार्थ करते। अंधे ने कहा-यदि मेरी आंख होती तो जहां कहीं अनुपयुक्त देखता, वहीं सुधारने में लग जाता। लंगड़े ने कहा-मेरे पैर होते तो दौड़-दौड़ कर भलाई का काम करता। निर्बल ने कहा-बल होता तो अत्याचारियों को मजा चखा देता। निर्धन ने कहा-धनी होता तो दीन-दुखियों के लिए सब कुछ लुटा देता। मूर्ख ने कहा-विद्वान होता तो संसार में ज्ञान की गंगा बहा देता। वरुणदेव उनकी बातें सुन रहे थे। उनकी सच्चाई परखने के लिए उन्होंने आशीर्वाद दिया। इन पांचों को उनकी इच्छित स्थिति मिल गई। परिस्थिति बदलते ही उनके विचार भी बदल गए। अंधा सुंदर वस्तुएं देखने में लगा रहता और इतने दिनों की अतृप्ति बुझाता रहा। लंगड़ा सैर सपाटे के लिए निकल पड़ा। धनी ठाठ-बाट जमा करने में लगा। बलवान ने दूसरों को आतंकित करना शुरू कर दिया। विद्वान ने अपनी चतुराई के बल पर जमाने को उल्लू बना दिया। बहुत दिन बाद वरुणदेव उधर से लौटे तो यह देखने के लिए रुक गए कि उन असमर्थों की प्रतिज्ञा पूरी हुई या नहीं। वे पांचों अपनी-अपनी स्वार्थ सिद्धि में लगे मिले। वरुणदेव बहुत खिन्न हुए और अपने दिए हुए वरदान वापस ले लिए।