भारतीय संस्कृति में अहंकार का विगलन है प्रणाम
   Date09-Jul-2019

धर्मधारा
ह मारे भारतीय शाों में प्रणाम करने की परम्परा का उल्लेख वर्षों से मिलता है। प्रणाम के भाव से जब भी कोई व्यक्ति अपने से बड़ों के समक्ष जाता है तो वह प्रणीत हो जाता है। प्रणाम का सीधा संबंध प्रणीत से है, जिसका अर्थ है - विनीत होना, नम्र होना और किसी के सामने शीश झुकाना। प्रणीत व्यक्ति अपने दोनों हाथ जोड़कर और उन हाथों को अपने वक्षस्थल से लगाकर बड़ों को प्रणाम करता है। कहा जाता है कि प्रणाम करते समय दोनों हाथ की अंजलि, वक्षस्थल से सटी हुई होनी चाहिए। ऐसा करने के पीछे यह कारण बताया जाता है कि प्रतीक स्वरूप हमारा पूरा अस्तित्व सम्मानीय व्यक्ति के सम्मुख समर्पित हो रहा है। वक्षस्थल से हाथ जोडऩे का अर्थ हृदय के हृदय से संबंध से है। भारतीय परम्परा में इसी प्रकार प्रणाम करने की परम्परा रही है। इसके अलावा प्राचीनकाल में गुरुकुलों में दंडवत प्रणाम करने का विधान भी रहा है, जिसमें शिष्य-गुरु या अन्य किसी विशेष व्यक्ति के चरणों में साष्टांग लेटकर प्रणाम करते हैं। इस तरह के प्रणाम करने का उद्देश्य यह है कि गुरु के चरणों के अंगूठे से प्रवाहित हो रही ऊर्जा को अपने मस्तिष्क पर धारण किया जाए। ऐसा माना जाता है कि इस ऊर्जा के प्रभाव से शिष्य के जीवन में परिवर्तन होने लगता है। भारतीय धर्मशाों में ऐसा करने पर गुरु द्वारा हाथ उठाकर आशीर्वाद देने का भी विधान है। शाों के अनुसार जब गुरु हाथ उठाकर आशीर्वाद देते हैं, तब उनके हाथ की अंगुलियों से निकला ऊर्जा का प्रवाह शिष्य के मस्तिष्क में प्रवेश कर जाता है, जो उसके जीवन को प्रभावित करता है।