बारिश और पुराने पुल व बांध...
   Date09-Jul-2019

इंदौर से लगाकर मुंबई और गुजरात तक की बारिश ने हमारी इस प्रशासनिक व्यवस्था एवं बारिश के समय आपदा से निपटने की तैयारियों की पोल खोलकर रख दी है... मुंबई हर साल बारिश में पानी-पानी होती है... 3-3, 4-4 दिनों तक शहर की कॉलोनियों का ही आपस में सम्पर्क कट जाता है... यह स्थिति जल जमाव से लेकर बारिश के जल की निकासी न होने के कारण होती है... यही हाल अब इंदौर, भोपाल व अन्य शहरों में होने लगा है... दूसरी तरफ पुराने पुल, बांध के साथ ही रेलवे समपार पर फाटक न होने के चलते किस तरह के हादसे आए दिन होते रहते हैं... इसे हमने बहुत ही पीड़ादायी एवं हृदयविदारक हादसों का सामना करके देखा भी है... लेकिन न तो हमारे शासन-प्रशासन के कानों पर जूं रेंगती है और न ही आमजन में जिम्मेदारी का भाव आ पा रहा है...
उत्तर प्रदेश में यमुना एक्सप्रेस वे पर भीषण बस हादसे में दो दर्जन से अधिक लोग जान गंवा चुके हैं... इसके पूर्व उत्तराखंड में भी ऐसा ही भीषण हादसा हुआ था, महाराष्ट्र के रत्नागिरी में तिवरे बांध के टूटने से जान-माल की जो भारी हानि हुई है, वह अत्यंत दुखद और चिंताजनक है... बेहिसाब बहते पानी की वजह से करीब 10 लोगों के काल के गाल में समा जाने और अनेक के लापता होने की सूचना ने बांधों पर हमारे विश्वास को नए सिरे से हिला दिया है... पानी रोकने के लिए बांध बनाए जाते हैं और अगर पानी रोकने में बांध नाकाम हो रहे हैं, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है..? बताया जा रहा है, तिवरे बांध में दरार की शिकायत पहले ही हो चुकी थी... जिस दरार को गांव के लोग भी देख पा रहे थे, वह दरार अधिकारियों को कैसे नजर नहीं आई..? क्या यह मान लिया जाए कि जिस तरह की लापरवाही तिवरे बांध के अधिकारियों ने बरती है, वैसी ही लापरवाही दूसरे बांधों के अधिकारी भी बरत रहे होंगे..? तिवरे बांध हादसे ने एक ऐसा बड़ा प्रश्न पैदा कर दिया है, जो देश के 3,200 से ज्यादा बांधों के इर्द-गिर्द मंडराने लगा है... उन तमाम गांवों में चिंता की लहर होगी, जो बांधों के साये में बसते हैं...
देश के ज्यादातर इलाकों में बारिश आ चुकी है या आने वाली है, तो मौका है, तमाम बांधों की ईमानदार जांच कर ली जाए... बांधों, नहरों की देख-रेख में स्थानीय लोगों की भागीदारी का भी समय आ चुका है। यह मानव स्वभाव है, जिनकी जान खतरे में होती है, वे किसी भी आशंका के लिए जगह नहीं छोड़ते... बेशक, अगर तिवरे बांध टूटा है, तो इसका सीधा अर्थ है जिम्मेदार अधिकारी स्वयं को सुरक्षित मानकर बैठे थे... ऐसे अधिकारियों को लोगों के जीवन से खेलने का अगला मौका नहीं मिलना चाहिए... बांधों और जल भंडारों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को ध्यान देना चाहिए कि बांध कोई भी टूटे, उसके हा-हाकार में विश्वास टूटने का दर्द भी शामिल है... बांध की तो मरम्मत हो जाएगी, लेकिन विश्वास की बहाली कैसे होगी, इसके बारे में महाराष्ट्र सरकार को ही नहीं, बल्कि देश की तमाम सरकारों को सोचना चाहिए...क्योंकि जब पुराने हो चुके पुल, बांध एवं ओव्हर ब्रिज से लेकर वे सभी पुराने पुल-पुलिया जो लगातार भीषण हादसों का संकेत कर रहे हैं, उनसे समय रहते निपटने की तैयारी क्यों नहीं है..?
बारिश की शुरुआत में ही बांध की यह टूट अनेक प्रश्न पैदा कर गई है, जिन पर हमें अवश्य गौर करना चाहिए... क्या हमारे देश में अनेक बांध और उनके कल-पुर्जे पुराने पड़ चुके हैं..? क्या बांधों की देख-रेख, चौकसी पहले जैसी नहीं हो रही है..? देश में कितने ऐसे बांध हैं, जिनके पुुनरोद्धार या मरम्मत की तत्काल जरूरत है..? कितने ऐसे बांध हैं, जहां अब पानी नहीं आता और कितने ऐसे बांध हैं, जहां पहले की तुलना में ज्यादा पानी आने लगा है..? एक मूल प्रश्न तो शायद बांध के प्रश्न से भी कहीं बड़ा है, क्या हम बारिश को ठीक से सहेज पा रहे हैं..? अभी तेज बारिश के कारण भारत की व्यावसायिक राजधानी मुंबई का जो हाल है, वहां 28 के करीब लोग जान गंवा चुके हैं... तिवरे बांध और मुंबई के बीच दूरी 300 किलोमीटर भी नहीं है... एक जगह बारिश नहीं संभल रही, तो दूसरी जगह बांध... मुंबई में बारिश तो मानो सामान्य वार्षिक परिघटना हो गई है... यातायात और जीवन बुरी तरह से प्रभावित हुआ है... इस बारिश में यह जलशक्ति मंत्रालय और देश के लिए एक सबसे बड़ा प्रश्न होना चाहिए कि जो बारिश देश के सबसे तेज बढ़ते शहर को थाम ले रही है, उसका क्या किया जाए..? जब हम इस दिशा में ईमानदार चिंतन शुरू करेंगे, तब समाधान की दिशा में बढ़ चलेंगे...