क्या राहुल अब भारत नवनिर्माण का विरोध करेंगे?
   Date09-Jul-2019

जयकृष्ण गौड़
रा हुल गांधी ने अपनी चालाकी से कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफे देने की संभावना और अटकलों पर विराम लगा दिया है। इस्तीफे के जो कारण बताए, उससे लगता है कि उन्होंने जनादेश को स्वीकार करने की बजाय चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर सवाल उठाए, सरकारी मशनरियों का विश्वसनीय पर संदेह व्यक्त किया। यह भी आरोप लगाया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा किया जा रहा है। उनके अनुसार चुनाव केवल औपचारिक रह जाएंगे, उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारों के खिलाफ संघर्ष करने की बात कही। गौरी लंकेश की हत्या के मामले में संघ पर आरोप लगाए। इस पर मानहानि का मामला स्वयंसेवक ने दायर किया। इस मामले में पंद्रह हजार के मुचलके पर मुंबई की एक कोर्ट से रिहा होने के बाद जिहादी मूड में उन्होंने कहा कि आक्रमण हो रहे हैं, मजा आ रहा है, अब मैं दस गुना अधिक संघर्ष करूंगा। संघ के विचारों से संघर्ष करने की बात वे बार-बार दोहराते हैं। इस्तीफे के कारणों से उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें अकेले ही संघर्ष करना पड़ा। पराजय की जिम्मेदारी नेताओं को लेना चाहिए। चुनाव परिणाम आने के 39 दिन बाद राहुल का इस्तीफा सार्वजनिक हुआ।
यह समाचार भी तैरता रहा कि कमलनाथ और अशोक गेहलोत पर निशाना साधते हुए राहुल ने कहा कि ऐसे नेताओं ने अपने बेटों को जीताने में अपना ध्यान केन्द्रित किया, इसलिए अन्य प्रत्याशियों को हार का सामना करना पड़ा। राहुल के इस्तीफे को कार्य समिति द्वारा स्वीकार किया जाना है, इसके बाद किसी अन्य नेता के सिर पर अध्यक्ष पद का ताज पहनाया जाएगा। वैसे मोतीलाल नेहरू से लेकर सोनिया-राहुल तक चाहे कोई दूसरा अध्यक्ष बना हो, चाहे इस परिवार के बाहर का प्रधानमंत्री बना हो, लेकिन रिमोट कंट्रोल इसी परिवार के हाथों में रहा। यही कारण है कि नरसिम्हा राव सरकार ने इस परिवार की अनदेखी की तो उनकी सरकार को लडख़ड़ाते हुए चलने को बाध्य किया। मनमोहन सरकार भी इसी परिवार के रिमोट कंट्रोल से चली। सीताराम केसरी अध्यक्ष बने, उन्होंने इस परिवार को आंख दिखाने की कोशिश उन्हें भी अपमानित कर बाहर का रास्ता दिखाया। सन् 1969 में इंदिराजी ने अपना वर्चस्व कांग्रेस पर बनाए रखने के लिए सिंडीकेट नेताओं को जिनमें मोरारजी भाई, के. कामराज, जगजीवनराम, निजलिंग अप्पा प्रमुख थे, उन्हें बाहर का रास्ता दिखाते हुए स्वयं कांग्रेस की सर्वेसर्वा बन गई। तब से कांग्रेस का अधिकृत नाम इंदिरा कांग्रेस हो गया। कांग्रेस की संगठनात्मक पहचान तो 1969 में ही समाप्त हो गई। तब से इंदिराजी की कांग्रेस हो गई, उनके विचार की कांग्रेस के विचार हो गए। इसके बाद राजीव कांग्रेस और अब सोनिया-राहुल की कांग्रेस है। अब राहुल के विचार ही कांग्रेस के विचार है। अंग्रेज की कोख से पैदा हुई कांग्रेस के प्रारंभिक वर्ष अंग्रेज सरकार के गुणगान में बीता, लोकमान्य तिलक, सुभाषचन्द्र बोस के समय कांग्रेस का राष्ट्रवादी स्वरूप बना, लेकिन आजादी के बाद कांग्रेस में न तिलक रहे, न सुभाष रहे और न गांधी रहे, फिर नेहरूजी की कांग्रेस हो गई, तभी से सेकूलर, समाजवाद को नीति के रूप में अपनाने का उद्घोष हुआ। सेकूलर नीति का जमीनी स्वरूप हिन्दू विरोधी तुष्टिकरण हो गया। मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए कांग्रेस ने हिन्दू की धार्मिक सांस्कृतिक भावना को अपमानित करने की कोई कसर नहीं छोड़ी। राष्ट्र हित को अनदेखी की। अनदेखी कर कांग्रेस का ध्यान केवल वोट बंटोरकर सत्ता पर काबिज होने का रहा। इंदिराजी ने गरीबी हटाओ के नाम पर वोट बंटोरे।
देश विभाजन की स्वीकृति किसने दी? कश्मीर समस्या को राष्ट्र संघ में किसने उलझाया? इसी समस्या में से आतंकवाद के प्रेत पैदा हुए, उत्तरी सीमा की सुरक्षा को कमजोर कर चीन की दोस्ती के जाल में कौन फंसा? 1962 में चीन ने हमला कर हजारों वर्ग मील भारत भूमि पर चीन को काबिज किसने होने दिया? किनके कारण राम मंदिर निर्माण का मामला लंबे समय तक उलझाया, किन नीतियों के कारण राजनीति भ्रष्टाचार के कीचड़ में लतपथ दिखाई दी? किनके कारण राजनीति वंशवाद, जातिवाद की बंधक बन गई? किसने 1975 में लोकतंत्र का गला घोटकर आपातकाल लगाया? किसने मीडिया पर सेंसर का ताला लगाया? किसने न्याय पालिका को प्रतिबद्ध (कमिटेड) किया? कौन आज देश के टुकड़े वाले गिरोह के साथ खड़ा दिखाई देता है? कौन अलगाववादियों देशद्रोहियों की पैरवी करता है? किसने हिन्दू आतंकवाद की बात कहकर हिन्दुओं को अपमानित किया? क्या इन्हीं विचारों और नीतियों के लिए राहुल संघर्ष करेंगे? इन्हीं कांग्रेस के विचारों को नकार भारत की जनता ने संस्कृति आधारित राष्ट्रवाद को स्वीकार किया है। यदि राहुल राष्ट्र हित की नीतियों को नकार नेहरू, इंदिरा की लोकतंत्र और देश विरोधी नीतियों को अपनाकर उन्हीं नीतियों के रास्ते पर चले तो कांग्रेस को अपने बल पर खड़ी करने के प्रयास सफल नहीं हो सकते। कांग्रेस को सेकूलर जुमले से पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता। ये विचार साम्यवादी विचारों की तरह किसी अंधकूप में पड़े सिसकते रहेंगे, जिन संघ के विचारों से टकराने की बात राहुल करते हैं, जिस राजनीति की प्राथमिक कक्षा में भी राहुल पास नहीं हो सके।
करीब पंद्रह वर्षों से राजनीति में अवसर मिलने के बाद भी राहुल परिपक्व नहीं हो सके। जो कांग्रेस को ही नहीं समझ सके, उनसे राष्ट्रीय स्यवंसेवक संघ के विचार और उसकी संस्कार पद्धति जानने, समझने की अपेक्षा करना बेकार है? संघ का इतिहास और वर्तमान देश के लिए समर्पित रहा। तेरा वैभव अमर रहे, मां हम दिन चार रहे या नहीं रहे। भारत माता की वंदना और उसकी सेवा के लिए सम्पूर्ण जीवन समर्पण करने के संस्कार संघ की शाखा पद्धति से मिलते हैं। संघ के स्वयंसेवक अखंड भारत के भाव बोध और संकल्प से प्रेरित है। संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार प्रारंभ में लोकमान्य तिलक की राष्ट्रवादी कांग्रेस के न केवल अनुयायी रहे, लेकिन उन्होंने कांग्रेस के विभिन्न पदों पर रहकर आजादी के आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। 1925 से अभी तक 94 वर्ष की संघ यात्रा केवल देश के लिए रही। संघ ने देश विभाजन का प्रखर विरोध किया। संघ के विचारों से साक्षात्कार करना हो तो 1947 में विभाजन के पांच दिन पूर्व संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी (माधव सदाशिव गोलवलकर) के कराची की विशाल जनसभा में दिए उद्बोधन का स्मरण करना चाहिए। पू. गुरुजी ने कहा था- 'हमारी मातृभूमि पर विपदा आ गई है। भारत का विभाजन एक पाप है तथा जो इसके लिए उत्तरदायी है, उन्हें भावी पीढिय़ां कभी क्षमा नहीं करेगी। यह अप्राकृतिक है, तथा इसे निरस्त करना होगा। जो कुछ हुआ है, वह अंग्रेजों की फूट डालो राज करो की नीति का विष फल है। मुस्लिम लीग ने जबर्दस्ती तथा हिंसा से पाकिस्तान को प्राप्त किया है। जिसके सामने कांग्रेस नेतृत्व ने घुटने टेक दिए।Ó संघ की प्रेरणा से विभिन्न क्षेत्रों में जो संस्थाएं सक्रिय है, वे भी राष्ट्रीयता के आधार पर खड़ी है। चाहे श्रमिक क्षेत्र में काम करने वाला भारतीय मजदूर संघ हो, छात्रों का संगठन, अ.भा. विद्यार्थी परिषद् हो, शिक्षा को संस्कृति संस्कार के साथ जोडऩे वाली विद्या भारत हो, जिसने कई शिक्षा संस्थान खड़े किए हैं। वनवासियों के िलए वनवासी कल्याण परिषद् सेवा कार्य कर रही है। संघ या स्वयंसेवकों द्वारा संचालित जो संस्थाएं है, वे सब संस्कृति आधारित राष्ट्रीय विचारों की है। इसी विचार को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहा गया है। इन्हीं विचारों से प्रेरित है भारतीय जनता पार्टी। भाजपा का पूर्व का नाम जनसंघ था। कश्मीर को दो निशान, दो विधान, दो प्रधान से भारत से अलग पहचान की रेखा के विरोध में डॉ. मुखर्जी के नेतृत्व में प्रखर आंदोलन हुआ, देश की अखंडता के लिए डॉ. मुखर्जी का बलिदान हुआ। आज भी भाजपा कश्मीर और भारत के बीच लकीर खींचने वाली अस्थायी धारा 370 का न केवल विरोध कर रही है, बल्कि उसे खत्म करने की भी पहल प्रारंभ हो गई है। संघ के विचारों से प्रेरित ही आज भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और कई मंत्री है, जो नवभारत के निर्माण और भारत को दुनिया में सबसे अधिक समृद्ध और शक्तिशाली बनाने के अनुष्ठान में जुटे है। देश के लिए जीवन का कण-कण और पल-पल समर्पित करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी है। आज भारत का नेतृत्व संघ के देश भक्ति के संस्कारों से प्रेरित है। क्या राहुल गांधी संघ प्रेरित राष्ट्रीय विचारों का विरोध करेंगे? क्या भारत के नवनिर्माण का विरोध करेंगे? (लेखक - वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक)