अन्याय का प्रतिकार
   Date09-Jul-2019

प्रेरणादीप
क लकत्ता में जन्में कन्हाईलाल दत्त क्रांतिकारी थे। वे अपने साथियों के साथ बम बनाते पकड़े गए। इन्हीं के दल का एक व्यक्ति नरेन्द्र गोसाईं मृत्यु के भय से व प्रलोभन में आकर सरकारी गवाह बन गया। कन्हाईलाल को यह देशद्रोह असह्य लगा। उन्होंने जेल में ही किसी प्रकार रिवाल्वर मंगा ली। नरेन्द्र को एक सरकारी अस्पताल में रखा गया था। कन्हाईलाल दत्त पेट दर्द का बहाना बनाकर अस्पताल पहुंचे और नरेन्द्र से मिलने की इच्छा प्रकट की। कारण पूछने पर बोले कि वे भी सरकारी गवाह बनना चाहते हैं। नरेन्द्र व जेलर जैसे ही उनसे मिलने आए, उन्होंने उन पर गोलियों की बौछार कर दोनों को मार दिया। इस घटना ने अंग्रेज हुकूमत को झकझोर कर रख दिया। उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई, तब भी वे हंसते-हंसते संसार से विदा हो गए। उनकी मुस्कान यह संदेश देकर गई- अन्याय चाहे जितना भी बड़ा हो, उसका प्रतिकार करने का साहस न करना अपने मानवीय कर्तव्यों की उपेक्षा करना है। अन्याय का अंधकार चाहे जितना भी सघन हो, एक आदर्शवादी व्यक्ति उसको मिटाने के लिए अपने कर्मों का प्रकाश करके ही रहता है।