'हम दो-हमारे दोÓ का नारा प्रत्येक वर्ग पर लागू हो...
   Date07-Jul-2019

शक्तिसिंह परमार
वि श्व की सर्वाधिक जनसंख्या वाले राष्ट्रों में भारत दूसरे पायदान पर है, फिलहाल जनसंख्या के मामले में चीन भारत से आगे यानी सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है... लेकिन रह-रहकर यह चेतावनी दी जा रही है और दावे भी किए जा रहे हैं कि अगर भारत में जनसंख्या वृद्धि का असंतुलित ग्राफ इसी तेजी से आगे बढ़ता रहा तो संभवत: 2040 तक भारत चीन को आबादी के मामले में पीछे धकेल देगा... हालांकि चीन में घटती आबादी के पीछे एक दूसरा कारण यह भी है कि उसकी एक बड़ी आबादी बुढ़ापे की कगार पर है... जबकि भारत में विश्व के सर्वाधिक युवा यानी 21 से 35 साल के करीब 65 फीसदी से अधिक हैं... या कहें कि भारत सर्वाधिक युवा देश है... ऐसे में आबादी का बढऩा तो भारत में स्वाभाविक है, लेकिन उससे जुड़े नुकसान-फायदे को समान तराजू पर तौलकर ही समाधान निकाला जा सकता है... क्योंकि एकतरफा चश्मा किसी भी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि विवाद के साथ ही अशांति को बढ़ावा देने का ही कारण बनता है... इसलिए समय के मान से जनसंख्या के नियंत्रण और उसके लिए उचित रूप से संसाधनों, आवश्यकताओं की आपूर्ति का रोडमेप या कहें कि दक्षता भारत को समय पूर्व बढ़ानी होगी...
वर्तमान में भारत की जनसंख्या कोई सवा सौ करोड़ बताता है, तो कोई इसे 130 से 135 करोड़ भी गिनाने से नहीं चूकता... वास्तविकता में भारत की जनसंख्या अगले एक वर्ष बाद कितनी होगी, इसका अधिकृत आंकड़ा तो 2021 की जो जनगणना होगी, उसी से स्पष्ट होगा... क्योंकि फिलहाल हम 2011 की जनगणना में जो जनसंख्या का आंकड़ा सामने आया, उसी को अपने-अपने मान से आगे बढ़ाकर भारत की आबादी के अनुमान व्यक्त करते रहे हैं... भारत की जनगणना 2011 को जनगणना आयुक्त सी. चंद्रमौली द्वारा राष्ट्र को समर्पित भारत की 15वीं राष्ट्रीय जनगणना माना गया है.., जो 1 मई 2010 को आरम्भ हुई थी... भारत में जनगणना 1872 से की जाती रही है और यह पहली बार है, जब बायोमेट्रिक जानकारी एकत्रित की गई... जनगणना को दो चरणों में पूरा किया गया... अंतिम जारी प्रतिवेदन के अनुसार, भारत की जनसंख्या 2001-2011 दशक के दौरान बढ़कर 1,21,08,54,977 हो गई है... इस दौरान देश की साक्षरता दर भी 64.83 प्रतिशत से बढ़कर 69.3 प्रतिशत हो गई है... जनगणना में बड़ा बदलाव यह हुआ कि अब हर 10 साल में फरवरी में जनगणना को पूरा किया जाता है। 1872 से लेकर 1931 तक जाति के आधार पर जनगणना होती रही, लेकिन उसके बाद आज तक जाति के आधार पर जनगणना नहीं हुई है... 1 जून 2021 से शुरू हो रही जनगणना को लेकर इसी विषय पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं...
इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत में जनसंख्या की बढ़ती रफ्तार किसी जनसंख्या विस्फोट की भांति एक बड़ी समस्या के रूप में आकार ले रही है... यह जनसंख्यारूपी मानव बम कब फूट जाए, कह नहीं सकते... फूटने से तात्पर्य यही है कि जब देश की धरती, सीमाएं, संसाधन और उपभोग के वे सभी निर्भरता वाले कारक सीमित हैं या फिर शनै: शनै: सीमित होते जा रहे हैं, तब सिर्फ उनका उपभोग करने वाली आबादी ही बिना रुके ऐसे ही बढ़ेगी, तो समस्याएं घटने के बजाय बढ़ती चली जाएंगी... कहने को तो जनसंख्या का एक बड़ा प्रवाह गांव से शहरों की तरफ हो रहा है... गांव शनै: शनै: नहीं, बल्कि बहुत तेजी से या तो गायब हो रहे हैं या वे गांव ही शहर का रूप ले रहे हैं... इसलिए जो ग्रामीण आबादी शहरों का रुख कर रही है, उनके लिए शहरी संसाधनों से बंटवारा लगातार बढ़ता जा रहा है... अब ये शहरी संसाधन या तो पहले की तुलना में चार गुना तेजी से बढ़ाए जाने की जरूरत है... या फिर शहरी और ग्रामीण जनसंख्या के मान से आवश्यक संसाधनों की पूर्ति और जनसंख्या संतुलन को बनाए रखने की पहल भी उतनी ही जरूरी है...
आजादी के बाद भारत में परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण को लेकर भी सरकारी स्तर पर कार्यक्रम तो बने और उनका कुछ हद तक हिन्दू समाज में असर भी हुआ... हम दो, हमारे दो... का नारा अगर सर्वाधिक सफल या फलीभूत हुआ तो उसमें हिन्दू समाज का सर्वाधिक योगदान रहा... लेकिन सवाल यह है कि क्या जनसंख्या के नियंत्रण और जनसंख्या को विस्फोटक रूप न लेने देने के लिए सिर्फ हिन्दू समाज ही जवाबदेह है..? जब देश के प्रत्येक संसाधन, सुविधा और उपभोग की प्रत्येक वस्तु पर, प्रत्येक जाति, धर्म, संप्रदाय, वर्ग और व्यक्ति का समान अधिकार है और वह उसे अपने मौलिक अधिकार के साथ प्राप्त करने का अधिकारी है, फिर जनसंख्या नियंत्रण में भी सभी की समान भागीदारी या कहें कि परिवार नियोजन का दायित्व देश के प्रत्येक नागरिक पर समानता के साथ लागू क्यों नहीं हो रहा... 'हम दो, हमारे दोÓ का नारा हर वर्ग पर लागू होना समय की मांग है...
जनसंख्या की बढ़ती रफ्तार में तो कहीं कोई कमी नजर नहीं आती... लेकिन एक ऐसा असंतुलन भी देश के अनेक राज्यों में तेजी से पैर पसार रहा है कि ऐसे दर्जनों जिले एक ही राज्य में बन चुके हैं, जहां हिन्दू-मुस्लिम जनसंख्या का अनुपात आसमानी अंतर ले चुका है... असम, पश्चिम बंगाल, केरल और कर्नाटक के साथ ही अन्य राज्य इसके ज्वलंत उदाहरण हैं... जब वर्ग-विशेष की इन राज्यों में आबादी बिना नियंत्रण के भयावह रूप से बढ़ेगी और उसी अनुपात में हिन्दू जनसंख्या घटती चली जाएगी तो इसके दुष्परिणाम कोकराझार से लेकर उप्र के बरेली, सरहानपुर, मुजफ्फरनगर और पश्चिम बंगाल के रानीगंज व दुर्गापुर में हमने देख लिए हैं... किस तरह से हिन्दू आबादी में वर्ग-विशेष में हिंसा का तांडव रचा था... यह जनसंख्या के भयावह असंतुलन का ही नतीजा है, इसलिए परिवार नियोजन कार्यक्रम जब भी और जहां भी शुरू होते हैं, तो इसको सभी लोगों पर समानता के साथ लागू करने की कार्य नीति अमल में लानी होगी... जनसंख्या नियंत्रण में जो वर्ग, जाति, धर्म, सहयोगी बनने में अपनी तमाम तरह की जबरिया धर्मगत अड़चनें गिनाने से बाज नहीं आते, उन्हें सरकारी सुविधाओं, संसाधनों, सेवाओं से पृथक करने के कड़े फैसले लेने होंगे... आबादी नियंत्रण से तात्पर्य यह नहीं कि आपातकाल के दौरान वाला जबरिया नसबंदी अभियान छेड़ा जाए... लेकिन जो जनसंख्या के नियंत्रण प्रबंधन में भागीदार नहीं बन सकते, उन्हें राष्ट्र की अन्य सुविधा संसाधनों से वंचित होना होगा... ऐसे कड़े फैसले और निर्णय अमल में जब आने लगेंगे, तो स्थितियां बदलेंगी...
जहां तक जनसंख्या के मान से संसाधनों की पूर्ति और उनके प्रबंधन का विषय है तो जब समान रूप से सभी क्षेत्रों में आबादी का ग्राफ संतुलित रहेगा तो हर तरह की सुविधा संसाधन ही सबको समान रूप से प्राप्त हो सकेगी... आज सरकारी अस्पतालों में वर्ग-विशेष के ही लोग उपचार करवाते नजर आते हैं... क्योंकि अन्य समुदाय वहां जाने से, कतार में लगने से कतराता है... क्योंकि इन्हीं लोगों की लंबी-लंबी लाइनें रहती हैं... सरकारी नौकरी में ही नहीं, बल्कि पंचायत से लेकर विधानसभा और लोकसभा तक में भी दो बच्चों का नियम लागू करना होगा... पंचायत में इसे प्रयोग के रूप में अपनाकर आबादी नियंत्रण सिर्फ एक छलावा है, जब दो से अधिक बच्चों वाला व्यक्ति पंच नहीं बन सकता तो सांसद, विधायक बनने का अधिकार संविधान कैसे दे सकता है..? यह 'हम दो, हमारे दोÓ का नियम हर वर्ग, हर व्यवस्था और हर जाति-धर्म पर समानता से लागू करके ही जनसंख्या विस्फोट को रोका जा सकता है...