राहुल का वैचारिक संघर्ष
   Date06-Jul-2019

राहुल गांधी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे चुके है। कार्य समिति में उनका इस्तीफा स्वीकार होना है। अपनी जिम्मेदारी से पलायन करने वाले राहुल गांधी भाजपा-संघ के विचारों से संघर्ष करने और दस गुना अधिक जूझने ही बात कर रहे है। गौरी लंकेश हत्याकांड में रा.स्व.संघ का नाम लेने से उनके खिलाफ एक स्वयंसेवक ने मानहानि का मामला दायर किया। इस मामले में राहुल गांधी और माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी कोर्ट में प्रस्तुत हुए। मुंबई की शिवड़ी कोर्ट के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने इन दोनों को 15 हजार रु. के निजी मुचलके पर जमानत दे दी। कोर्ट के बाहर परिक्रमा करने वाले कांग्रेसी राहुल के समर्थन में नारेबाजी कर रहे थे। कोर्ट के बाहर निकलने के बाद उन्होंने कहा कि यह विचारधारा की लड़ाई है, आक्रमण हो रहा है मजा आ रहा है। गरीब, किसान, दलितों के लिए वे संघर्ष करते रहेंगे। कहा गया कि कोर्ट में वे लगाए गए आरोप से मुकर गए। माकपा के येचुरी जिनके विचारों को दुनिया की अधिकांश जनता ने नकार दिया है। भारत में भी जनता ने इन कामरेडो को विचारों के कूड़ेदान में फैंक दिया है। राहुल गांधी और येचुरी में अंतर केवल यह है कि जहां कम्युनिस्टों का भारत में अस्तित्व समाप्त हो चुका है, जिस प. बंगाल में कम्युनिस्टों ने तीन दशक से अधिक समय तक शासन किया, उसी प. बंगाल में 2018 के चुनाव में लोकसभा की एक सीट भी प्राप्त नहीं हुई। अब केवल केरल तक सीमित है। कांग्रेस अपने अस्तित्व के संघर्ष से जूझ रही है। जूझने की बजाए राहुल के लिए जौहर शब्द अधिक प्रासंगिक है, जिस तरह राजपूत अपनी हार को सुनिश्चित मानकर केशरिया बाना पहनकर दुश्मनों के साथ युद्ध कर समाप्त हो जाते थे। उसी तरह राहुल गांधी की कांग्रेस न केवल चुनाव में पराजित हुई, बल्कि कांग्रेस की हिन्दू विरोधी सेकुलर नीति और देश के दुश्मनों के साथ गलबहियां के विचार को भी जनता ने नकार दिया है। करीब पचास वर्षों तक कांग्रेस का शासन रहा। सभी सरकारी गैर सरकारी संस्थाओं पर कांग्रेस का कब्जा था। इंदिराजी ने न्याय पालिका पर भी शिकंजा कसा। देश विभाजन से लेकर कश्मीर समस्या के लिए केवल कांग्रेसी दोषी है। क्या राहुल गांधी इन देश विरोधी विचारों के लिए संघर्ष करेंगे? जो राहुल झूठे आरोप लगाते है, क्या वे अपने झूठ के लिए संघर्ष करेंगे? नेशनल हेराल्ड के घोटाले में सोनिया-राहुल जमानत पर हैं। क्या वे अपने घोटालों के लिए संघर्ष करेंगे? यदि घोटालेबाजी में जेल हुई तो वे विचारों की लड़ाई कहकर हीरो बनने की कोशिश करेंगे? पराजय की हताशा में उनके दिलोदिमाग में संघ का भय सता रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कारों से प्रेरणा लेकर कई लोगों ने देश के लिए जीना सीखा हंै। इन्हीं संस्कारों से प्रेरित राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और कई मुख्यमंत्री है। इन्हीं देशभक्ति के संस्कारों से प्रेरित होकर कई लोग समाज सेवा के लिए समर्पित है।
दृष्टिकोण
यही भारत का सांस्कृतिक जीवन
भारत का जीवन राजनीति से संचालित नहीं होता, चाहे राजनीतिक प्रदूषण का वातावरण् हो। लेकिन इस प्रदूषण से जनजीवन प्रभावित हुए बिना अपने धार्मिक, सांस्कृतिक जीवन में समरस दिखाई देता है। एक ओर राहुल गांधी के इस्तीफे से कांग्रेस के भविष्य को लेकर चर्चा हो रही थी। राजनीतिक पंडित इस बारे में माथापच्ची कर रहे थे। दूसरी ओर भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के साथ लाखों श्रद्धालु भगवान के रथ को खींचकर पुण्य लाभ प्राप्त कर रहे थे। कोई भगवान के रथ के मार्ग पर झाड़ू से सफाई कर रहा था, कोई मृदंग बजाते हुए भगवान का गुणगान कर रहा था। जगन्नाथपुरी में रथयात्रा के साथ जन सागर उमड़ रहा था तो प. बंगाल की राजधानी कोलकाता में मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी रथयात्रा का पूजन कर जय जगन्नाथ में अपना स्वर मिला रही थीं। टीएमसी की सांसद नूसरत जहां भगवान जगन्नाथ के सामने हिन्दू परंपरा के अनुसार नृत्य कर रही थीं। वे मुस्लिम होने के बावजूद हिन्दू परंपरा का निष्ठा के साथ पालन करती दिखाई दी। यही नहीं जब वे लोकसभा में शपथ के लिए पहुंची तो सभी की निगाहें उन पर टिक गई। मुस्लिम होते हुए भी वे बंगाली साड़ी पहने हुए थीं। उनके माथे पर बिंदिया चमक रही थी। हाथों में चूड़ा पहिने थीं। हिन्दू दुल्हन की तरह सजी नूसरत जहां ने शपथ लेने के बाद न केवल वंदेमातरम् का उद्घोष किया, बल्कि स्पीकर के पैर छूकर आशीर्वाद भी प्राप्त किया। मुल्ला-मौलवियों को यह सब अखरा, लेकिन भारत में जितने मुस्लिम है उनके पूर्वजों की विरासत है हिन्दू संस्कृति। उसी संस्कृति की वाहक के रूप में नूसरत जहां ने भगवान जगन्नाथ की पूजा-अर्चना की। अहमदाबाद में भी भगवान जगन्नाथ की यात्रा निकली। भाजपा अध्यक्ष एवं गृहमंत्री अमित शाह ने पत्नी के साथ रथयात्रा का पूजन किया। मुख्यमंत्री रूपानी भी उनके साथ थे।