ध्यान एक आध्यात्मिक शल्य चिकित्सा
   Date06-Jul-2019

धर्मधारा
ध्यान में मन को, चित्त को ऊर्जावान बनाया जाता है। फ्रायड के अनुसार इस जीवन में बचपन से लेकर अब तक जो कुछ किया गया है, वह सब मन में संग्रहित है। महर्षि पतंजलि कहते हैं कि बात यहीं तक सीमित नहीं है। चित्त में अब तक के सभी जन्मों के संस्कार संग्रहित होते हैं। फ्रायड के अचेतन की अवधारणा बचपन से लेकर अब तक के जीवन तक ही सीमित है। इससे बढ़कर महर्षि पतंजलि ने जो चित्त की अवधारणा दी है, उसका दायरा अब से पूर्व के सारे जन्मों तथा आने वाले सभी जन्मों को अपने में समेटे हुए हैं। इस चित्त में संस्कारों का जखीरा है। ये संस्कार बड़े विचित्र से होते हैं और हमारे जीवन को कुछ अद्भुत-सा मोड़ देते हैं, मोड़ लाते हैं। शुभ संस्कार उदय होते हैं, तो हमारे जीवन में शुभ घटनाक्रम, सुखद अनुभूतियां होती हैं और अगर संस्कार अशुभ हुए तो अशुभ घटनाक्रम, अशुभ परिस्थितियां, अशुभ का अंधेरा छा जाता है। ध्यान इन्हीं संस्कारों की चिकित्सा करता है। ध्यान से चित्त में संग्रहित संस्कारों की चिकित्सा की जाती है। ध्यान चिकित्सा का अध्ययन एवं अन्वेषण अब पाश्चात्य जगत में भी होने लगा है। सन् 1970 में जब अमेरिका के एक मनोवैज्ञानिक डॉ. रिचर्ड डेविडसन ने भारतीय योग और ध्यान की ताकत पर शोध प्रारंभ किया था, तब वे उपहास के पात्र बन गए थे, परंतु अब इसे संयुक्त राष्ट्र तक मान्यता प्रदान करता है। यहां तक कि अनेक प्रसिद्ध वैज्ञानिक इसी क्षेत्र में अपने अनुसंधान-अन्वेषण करते दिखाई पड़ते हैं। इनके अन्वेषणों का निष्कर्ष यह बताता है कि ध्यान से असाध्य शारीरिक बीमारियों में आश्चर्यजनक लाभ मिलता है, मन की ताकत में बढ़ोतरी होती है, यहां तक कि मस्तिष्क की संरचना में भी सकारात्मक बदलाव संभव होता है। डेविडसन ने विस्कान्सिन यूनिवर्सिटी में ध्यान एवं उसके प्रभाव पर अध्ययन किया था। मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल व हार्वर्ड मेडिसिन स्कूल में होने वाले एक अन्य शोध में यह पाया गया कि ध्यान से मानवीय मस्तिष्क में संरचनात्मक बदलाव आते हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि यदि आठ सप्ताह तक प्रतिदिन आधा घंटे तक ध्यान किया जाए तो न केवल बदलाव आता है, बल्कि अनुभूति करने, हमदर्दी दिखाने वाले हिस्से में भी बड़े बदलाव आते हैं। इस अध्ययन करने वाली टीम का नेतृत्व डॉ. ब्राइटा होजल ने किया था। एक और प्रयोग में अमेरिका के विस्कान्सिन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने पाया कि ध्यान से इनसान में सहानुभूति, दया, प्रेम, शांति और करूणा के भाव पैदा होते हैं। इनका कहना है कि ध्यान से नकारात्मक भाव कम होते हैं और सकारात्मक भाव पैदा होते है। ध्यान के प्रभाव का परीक्षण करने वाले डॉ. ब्राइटा होजल ने उन बौद्ध भिक्षुओं के मस्तिष्क की जांच की थी, जिनकी दैनिक साधना में ध्यान सम्मिलित था।